महात्मा गांधी की मूर्ति
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आचार्य कृपलानी काशी हिंदू विश्वविद्यालय छोड़कर काशी विद्यापीठ में आचार्य बने। उसी यात्रा के बीच उन्होंने गांधी जी से पूछा कि आगे क्या करना है। गांधी जी ने कहा कि कहीं बैठ जाओ और चरखे का काम संगठित रूप से करो।
गांधी जी की प्रेरणा पर आचार्य कृपलानी ने काशी से खादी एवं चरखे के संस्थागत संगठित आंदोलन की शुरूआत करते हुए देश की पहली खादी संस्था श्री गांधी आश्रम की नींव रखी। विद्यापीठ में बापू के कमरे को धरोहर के रूप में विकसित करने की तैयारियां की जा रही हैं।
वाराणसी के बेनियाबाग पार्क में गांधी चबूतरा काशी में बापू की अंतिम निशानी के तौर पर जाना जाता है। पार्क के सुंदरीकरण के कारण अब गांधी चबूतरे का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। समाजसेवी और स्थानीय लोगों ने प्रशासन से कई बार यह मांग की है कि गांधी चबूतरे को पुन: स्थापित किया जाए।
कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष प्रजानाथ शर्मा ने बताया कि गांधी चबूतरे पर ही बापू का अस्थि कलश रखा गया था। यह स्थल हर काशी वासी के लिए पूजनीय है। आज गांधी चबूतरे का अस्तित्व समाप्त हो चुका है और यह बेहद दुखद है। हम अपने राष्ट्रपिता की अंतिम निशानी भी सहेज कर नहीं रख सके। शकील अहमद जादूगर ने बताया कि डर्बीशायर क्लब की ओर से पिछले 15 सालों से बापू के चबूतरे को भव्य बनाने की मांग की जा रही है।
बेनियाबाग में पार्किंग निर्माण के दौरान चबूतरे को हटा दिया गया है। सरकार से हमारी मांग है कि बापू के चबूतरे को उसी स्थान पर बनवाया जाए। प्रो श्रद्धानंद ने बताया कि अंतिम बार बापू बीएचयू के रजत जयंती समारोह में 21 जनवरी 1942 को काशी आए थे। महोत्सव में भाग लेने के बाद वह कांग्रेसजनों से बातचीत में जल्द दोबारा आने का आश्वासन देकर विदा हुए, लेकिन इसके बाद उनका अस्थि कलश ही काशी आया था।