महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को ‘दंगल’ बेहद पसंद था। महामना को बचपन से ही कुश्ती का शौक था। इलाहाबाद में मोहल्ले के अखाड़े में वह अपने साथियों संग दंड-बैठक करने बाद कुश्ती भी लड़ा करते थे।
बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया के पहलवान पिता छेदीलाल चौरसिया ने ही मालवीय जी को कुश्ती लड़ना सिखाया था।
कुश्ती तो महामना का शौक था लेकिन उनका हमेशा जोर रहा कि विद्यार्थी न सिर्फ पढ़ाई में अव्वल रहें बल्कि वर्जिश और खेल को भी पूरी तवज्जो दें।
विद्यार्थियों के लिए उनका एक ही मंत्र था, ‘दूध पीयो कसरत करो नित्य जपो हरिनाम, मन लगाई विद्या पढ़ो पूरेंगे सब काम...’ और संदेश था, ‘वीर बनो, बहादुर बनो’।
बीएचयू की व्यायामशाला शिवाजी हॉल में महामना अक्सर जाते थे। विद्यार्थियों को कुश्ती लड़ते देख खुश होकर कहते थे, ‘मैंने कई साल कुश्ती लड़ी है। कुश्ती से मन में इतनी हिम्मत हो गई है कि अपने ड्योढ़े-दूने को कहीं पाऊं तो पटक दूं।’
अंतरराष्ट्रीय कुश्ती रेफरी रह चुके बनारस के गोवर्द्धन दास मेहरोत्रा ने लिखा है कि विद्यार्थियों को कुश्ती की प्रेरणा देने के लिए महामना ने 1936 में विश्व विजेता गामा पहलवान के नेतृत्व में जोड़ के लिए हमीदा और शहाबुद्दीन पहलवान को विश्वविद्यालय आमंत्रित किया था।
उसी शिवाजी हॉल के अखाड़े में हजारों छात्रों के बीच इन पहलवानों ने व्यायाम कसरत के बाद कुश्ती दंगल का प्रदर्शन किया था।
गामा मध्य प्रदेश के दतिया महाराज के पहलवान थे। उन्हें ‘लोहे का आदमी’ कहा जाता था। उन्होंने इंग्लैंड के पहलवान जिविस्को को दंगल में पटका था।
इस वजह से अंग्रेजों ने उन्हें गोली मारने के लिए पिस्तौल तक निकाल ली थी। विश्वविद्यालय आने पर महामना ने गामा को धन्यवाद दिया और 101 रुपये भेंट किए थे।
महामना मालवीय फाउंडेशन के महासचिव डॉ. उमेश दत्त तिवारी बताते हैं कि शाम के समय मालवीय जी छात्रावासों की ओर टहलने जाया करते थे। इस दौरान किसी छात्र को कमरे में पढ़ता देखते तो उसे पकड़ कर बाहर मैदान में खेलने के लिए निकाल देते थे।
व्यायाम और खेल के महत्व को समझते हुए ही महामना ने विश्वविद्यालय में बड़े-बड़े खेल मैदान भी बनवाए।
सभी संस्थान व संकायों का अपना एक अलग खेल मैदान है। इसके अलावा एक एंफीथिएटर ग्राउंड, छत्रपति शिवाजी जिम्नेजियम, बैडमिंटन हॉल, स्वीमिंग पूल और महाराजा डॉ. विभूति नारायण सिंह इनडोर स्टेडियम भी है।