वजह बताई गई कि जेल में शाकाहारी और मांसाहारी भोजन एक ही रसोई में बनेगा और कैदियों को एक साथ खाना परोसा जाएगा। कैदियों का धर्म भ्रष्ट होने की आशंका जताई गई। इस अफवाह ने लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया। विद्रोह के पीछे केवल धार्मिक अफवाह ही नहीं था।
शहर में बनाए गए फाटकों को तोड़ने का अंग्रेज अधिकारियों का आदेश भी लोगों को नागवार गुजरा। ये फाटक मोहल्लों की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। दूसरा बड़ा मुद्दा वृषोत्सर्ग किए गए सांड़ों को पकड़ने का आदेश था। मान्यता के अनुसार ऐसे सांड़ को बांधना धार्मिक रूप से निषिद्ध माना जाता था। इन सांडों की पीठ पर त्रिशूल के आकार का निशान दागकर उन्हें छोड़ दिया जाता था।
इसलिए पड़ा गौरैया शाही नाम
‘गौरैया’ उस समय मिट्टी से बनी छोटी पाइप को कहा जाता था, जिसका इस्तेमाल गांजा पीने के लिए चिलम के रूप में किया जाता था। इसकी लंबाई करीब पांच सेंटीमीटर बताई जाती है। दो अगस्त को जब नाटी इमली में अंग्रेज अधिकारी गाबिंस भीड़ को समझाने पहुंचे और वार्ता विफल हो गई तब भीड़ ने कुम्हारों की दुकानों में रखी मिट्टी की ‘गौरैया’ उठाकर अंग्रेज अधिकारियों पर हमला कर दिया। इसी घटना के कारण इस जनविद्रोह को ‘गौरैया शाही’ कहा जाने लगा।
काशी का यह पांच दिन का विद्रोह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें आम जनता ने अंग्रेज अधिकारियों का खुलकर विरोध किया। प्रशासन को फौज बुलानी पड़ी और कुछ मांगों को स्वीकार करना पड़ा। इतिहास के पन्नों में दर्ज ‘गौरैया शाही’ आज भी काशी के उस तेवर की याद दिलाती है, जब शहर की जनता ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने अपने धार्मिक विश्वास और अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की थी।