1857 की क्रांति के 58 साल पहले 14 जनवरी, 1799 को ही बनारस में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की आवाज बुलंद हो गई थी। अवध के 18 वर्षीय नवाब मिर्जा वजीर अली खान ने इसका नेतृत्व किया था। रामनगर में नजरबंद किए गए नवाब ने सात अंग्रेज सैन्य अफसरों और उनके कुछ संतरियों को मार डाला था। इस बात की गवाही देता है मकबूल आलम रोड स्थित ईसाईयों का कब्रिस्तान, जहां मारे गए चार अंग्रेज अफसरों को दफनाने के बाद उनकी याद में बनाए गए स्मारक पर वजीर अली का नाम दर्ज है। उन्हें उन अंग्रेज अधिकारियों का कातिल बताया गया है। आज भी चर्चा होती है कि बहादुर हो तो वजीर अली खान जैसा कि दुश्मन की कब्र पर भी शान से नाम दर्ज हो।
अवध के नवाब आसफउद्दौला के दत्तक पुत्र नवाब मिर्जा वजीर अली खान के चार माह के शासनकाल के बाद ही अंग्रेजों ने उन्हें हटाकर बनारस के रामनगर में नजरबंद कर दिया था। तत्कालीन गवर्नर जनरल के आदेश पर वजीर अली के आने-जाने और किसी से मिलने पर भी रोक लगा दी गई थी। अंग्रेजों के अत्याचार से आहत होकर वजीर अली ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का मन बना लिया। इसी बीच ब्रिटिश अधिकारियों ने वजीर अली को बनारस से कोलकाता भेजने का आदेश दे दिया। इससे गुस्साए वजीर अली ने अपने करीबी इज्जत अली और वारिस अली की मदद से 200 सिपाहियों की सेना तैयार की। साथ ही, खुद को बनारस से हटाने के फैसले के खिलाफ तत्कालीन कमांडर जार्ज फ्रेडरिक चेरी से मिलने की इच्छा जताई।
14 जनवरी,1799 को इज्जत अली और वारिस अली के साथ वजीर अली मिंट हाउस (बाद में टकसाल टाकीज बनी) स्थित चेरी के घर पहुंचे। बातचीत के दौरान ही वजीर अली ने चेरी पर हमला कर दिया। हमले में कमांडर चेरी, कैप्टन कॉनवे, रोबर्ट ग्राहम, रिचर्ड इवांस सहित सात अंग्रेज अफसर मारे गए। कमांडर चेरी के घर से कुछ दूर नदेसर में तत्कालीन मजिस्ट्रेट एम डेविस के घर भी वजीर ने अपनी सेना के साथ हमला किया। कुछ संतरी भी मारे गए। वजीर अली की बगावत की खबर मिलते ही मजिस्ट्रेट डेविस को बचाने के लिए ब्रिटिश फौज नदेसर पहुंची लेकिन वजीर अली की सेना पीछे नहीं हटी। आखिरकार वजीर अली की बगावत को दबाने के लिए कोलकाता से जनरल अर्सकिन को फौज लेकर आना पड़ा। तब वजीर अली यहां से राजस्थान चले गए। वहां अंग्रेजों ने वजीर अली को गिरफ्तार कर लिया और कोलकाता के फोर्ट विलियम जेल भेज दिया। वर्ष 1817 में वजीर अली की जेल में ही मौत हो गई।