सौभाग्य के प्रतीक सोलह गांठ के धागे बांधकर महिलाओं ने महालक्ष्मी का कठिन व्रत शुरू कर दिया। इसके साथ ही पौराणिक लक्ष्मीकुंड पर सोमवार को सोरहिया का मेला गुलजार हो गया।
महालक्ष्मी की नयनाभिराम प्रतिमाओं के विविध रूपों से दूकानें सज गईं। प्रतिमाएं खरीदने के साथ ही स्वर्ण, रजत आभूषणों से सुसज्जित महालक्ष्मी की परिक्रमा करने के लिए व्रती महिलाओं का रेला उमड़ पड़ा। सोरहिया का व्रत रखने वाली महिलाएं घरों में भी लक्ष्मी की 16 दिन तक सविधि पूजा करेंगी।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू हुआ सोरहिया का मेला पुत्र कामना के लिए रखा जाने वाला जीवितपुत्रिका व्रत तक चलेगा। सुबह पुजारी कमलेश पांडेय, सुरेश पांडेय ने सोलह गांठ के धागे का वितरण किया।
धागा लेने वाली महिलाओं ने सविधि पूजा के बाद व्रत रखा। दोपहर से ही लक्ष्मीकुंड पर महालक्ष्मी की प्रतिमाएं खरीदने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। कुंड के चारों तरफ लक्ष्मी प्रतिमाओं की खरीद के लिए महिलाओं, युवतियों की भीड़ लगी रही। शाम चार बजे से मंदिर में झांकी के दर्शन के लिए भक्तों का रेला उमड़ने लगा।
नारियल , चुनरी के साथ परिक्रमा पथ पर श्रद्धालुओं का रेला देर रात तक उमड़ता रहा। शीतला मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय ने बताया कि भगवान शिव द्वारा काशी में भेजी गई 64 योगिनियों में से मयूरी योगिनी ने जलतीर्थों की रक्षा के लिए काम किया था।
रामकुंड से लगे लक्ष्मणकुंड, सीताकुंड दोनों विलुप्त हो गए। लक्ष्मण कुंड की सोरहिया मेला की वजह से बाद में लक्ष्मीकुंड के नाम से जाना जाने लगा। 16 दिन के बाद इस कुंड पर पुत्र कामना के व्रत जीवितपुत्रिका की पूजा महिलाएं करेंगी।