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लोकगीत: बनारसी, मिर्जापुरी, चौलर...80 से ज्यादा शैलियों में गाई जाती है कजरी; इंटरनेट पर खूब की जाती है पसंद

Sun, 23 Aug 2026 04:51 PM IST
Aman Vishwakarma आशीष शुक्ला, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

कजरी पूर्वांचल की लोकसंस्कृति की समृद्ध परंपरा है, जिसे बनारसी, मिर्जापुरी, चौलर समेत 80 से अधिक शैलियों में गाया जाता है। इसमें महिलाओं के साथ पुरुषों की टोलियां भी जवाबी मुकाबले करती हैं। बदलते दौर में कजरी ने इंटरनेट पर भी अपनी जगह बनाई है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसके गीतों को खूब पसंद किया जा रहा है।
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उर्मिला श्रीवास्तव और डाॅ. मनोज मिश्रा। - फोटो : संवाद
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पूर्वांचल में कजरी और लोकगीतों का वही प्रेम है जो सावन और बारिश का। यहां महिलाओं के साथ ही पुरुष भी समूह में कजरी गाते और नाचते हैं। 80 से ज्यादा शैलियों में गाई जाने वाली कजरी अपनी मोहकता और मिठास के लिए मशहूर है। अब तो इंटरनेट पर भी कजरी श्रोताओं की संख्या तेजी से बढ़ी है।

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वाराणसी और आसपास के करीब दस जिलों की बात करें तो कजरी गायन महिलाओं के विरह में उसकी सबसे मजबूत दोस्त है। शृंगार में पक्की साथी, बारिश में धान लगाते किसानों के लिए ऊर्जा और दंगल में लड़ते पहलवानों के लिए वीरता की निशानी। 

यहां कजरी गायन की परंपरा इतनी मजबूत हुई कि मिर्जापुर की अजीता श्रीवास्तव को साल 2022 और उर्मिला श्रीवास्तव को साल 2024 में देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया। हालांकि बदले दौर में कजरी गायन की वो बात नहीं रह गई, लेकिन इतना जरूर है कि कजरी अभी भी लोगों के दिलों में बसती है। 

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अलग-अलग शैलियों में कजरी के बोल
  • सुमिरन : कहंवा से आवेलू माता भवानी अरे, कहंवा से आवईं महावीर से संवरिया।
  • चौलर : जसुदा कहें नंद से हंसि के, परि पइयां हो गोसईयां, हरि मोरे रेंगईं बेकईयां ना
  • डुनमुनिया : कहां धरू झुलनी उतारि बारी धनियां, मगिहंई तोहरा सजनवा ना
  • झूला : पटरा बंद कर हो बनवारी हम घर मारी हो जइबई ना
 
कजरी में लोगों की रुचि बढ़ रही है। गांवों के साथ ही शहरों में भी लोग कजरी को पसंद करते हैं। सावन में कलाकारों को महानगरों से बुलावा आता है। इंटरनेट के माध्यम से हमारी पहुंच बढ़ी है। जौनपुर में प्रमुख रूप से चौलर, डुनमुनिया और उठान कजरी गाई जाती है। - लालबहादुर यादव, कजरी कलाकार
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अच्छी बात है कि लोग इस प्रकार के कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में स्वयं से उपस्थित होते हैं।  पूरा प्रयास है कि यह गायन विधा एक बार फिर से अपने चरम पर पहुंचे।  कजरी अब जिला ही नहीं, प्रदेश व देश छोड़कर विदेश तक अपनी पहचान बना चुकी है। - उर्मिला श्रीवास्तव, पद्मश्री

पहले संचार के साधन कम थे। सावन में ससुराल गईं बेटियों के लिए मां-बाप के सीने में हूक उठती है। अब डिजिटल दौर ने हमारे सीने से वो हूक निकाल दी। हम करीब होकर भी बहुत दूर हो गए। परंपराएं फिर से खिल जाएं तो खुशी हो। - डॉ. मनोज मिश्रा, विभागाध्यक्ष, जनसंचार विभाग पूविवि जौनपुर
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