वाराणसी। होलिका में आग क्या लगी, बड़ी बाजार की होली बारात चल पड़ी। सात वार और नौ त्योहार की उक्ति वाली काशी में यूं तो कोई दिन बेरंग नहीं होता। हर आम और खास को रंगने की इजाजत रंगभरी एकादशी पर बाबा को गुलाल-अबीर अर्पित करने के बाद ही मिल गई लेकिन गुरुवार को तो कुर्ता फाड़ हंगामा करने का फरमान ही जारी हो गया।
टेसू के फूलों के रंग भले ही न मिलें लेकिन असली जंगली रंग लेकर हुरियारे निकल पड़े हैं। हास्य-व्यंग्य, गुप्त साहित्य और उपाधियों में पीएम नरेंद्र मोदी से लगायत मुलायम सिंह यादव तक की खबर ली गई है और वह भी ‘बुरा न मानो होली है’ के अधिकार के साथ। शुक्रवार को होली की उमंग शबाब पर पहुंच जाएगी। शाम को गंगा स्नान के बाद कोई चौसट्ठी देवी मंदिर जाएगा और कोई कविता सुनने टाउनहाल। शैव-वैष्णव, अभिजात्य-भदेस, अध्यात्म-काम के भेद फिलहाल स्थगित हैं और बस रंग और रस ही बरस रहा है।
शिव के घर बरसा रंग
रविवार को रंगभरी एकादशी पर भक्तों ने कई मन अबीर और गुलाल से बाबा विश्वनाथ से होली खेलकर ऐलान कर दिया कि अब काशी में पांच दिन केवल रंग बरसेंगे। इस दिन पीले गुलाल से परहेज किया गया लेकिन अब यह परहेज भी जाता रहा। साहित्य कहता है कि जिसके समीप सिंदूरवर्णी गणेश, पीला सिंह, सतरंगी मयूर, काला भुजंग और श्वेत नंदी हों वहां रंगों का भेद ही क्या। गुरुवार को मंगला आरती के बाद काशीपुरा, ललिता घाट, चौक, चौखंभा, बांसफाटक, लक्सा से गायक मंडलियां पहुंचीं और बाबा को होरी सुनाई।
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काशी में ब्रज की होली
वल्लभाचार्य संप्रदाय के षष्ठपीठ गोपाल मंदिर में फागुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से विशेष रंगोत्सव शुरू हो चुका है। बागीचे में तीन झूले लगाए गए हैं, जिन पर मुकुंद राय बीच में, गोपाल लाल बाएं और गोपीनाथ दाएं विराजमान हैं। पीठाधीश्वर श्याम मनोहर महाराज गोप-गोपियों (भक्तों) के साथ साथ रोजाना रंगों से ठाकुर जी संग होली खेल रहे हैं। रोज की तरह गुरुवार को दोपहर में भक्तों ने गुलाल उड़ाया और ठाकुर जी की ओर से कनक और रजत पिचकारी से उन पर रंग डाला गया। कीर्तन मंडलियों ने रसिया गायन किया। शुक्रवार तक यह सिलसिला चलेगा।
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देवर-भाभी की छेड़छाड़
गांवों और घरों में देवर-भाभी की छेड़छाड़ शुरू हो गई है। इसके गीत भी फिजा में गूंजने लगे हैं। अबकी मनोज तिवारी के चाहने वालों को भले ही निराश होना पड़ा हो लेकिन पवन सिंह का ‘रंग से करब मसाज’, खेसारी लाल ‘तनी सा लगा लीं’, ‘होली में के खोली’ जैसे गीतों के बीच भरत शर्मा व्यास के ‘श्याम खेलें होरी’ जैसे होली गीतों के 50 हजार एलबम बिक चुके हैं और चौराहों पर बजने भी लगे हैं। शुक्रवार को इन गीतों की धुन पर हुरियारे चौराहों पर नाचते नजर आएंगे। कोई उल्टा कपड़ा पहने नजर आएगा तो कोई मुखौटा लगाकर लेकिन फर्क तब पड़ेगा जब कपड़े, मुखौटे सब फाड़ दिए जाएंगे।
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अब वो रंग कहां
अभ्रक की घरिया रईसों के यहां बनती थी। पारिजात, केसर, टेसू, हल्दी को पीस कर उसमें इत्र मिलाया जाता था। जब घरिया फूटती थी तो सारा वातावरण सुगंधित हो जाता था। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के समय काशी में प्राकृतिक रंगों से ही होली खेली जाती थी। संगीतज्ञ डॉ. राजेश्वर आचार्य बताते हैं कि रईस पहले से ही दर्जी तैनात रखते थे। किसी पर रंग डालने के बाद उनके कपड़े का नाप लिया जाता था। दोपहर में रंग खेलना बंद होने के बाद सबको नए कपड़े पहनाकर विदा किया जाता था। ऐसी होली कश्मीरी मल, भद्दोमल, शेर वाली कोठी, कंगन की हवेली, काठ की हवेली के रईस परिवारों में खेली जाती थी।
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गुलकंद, ठंडई और भंग
भोले की नगरी काशी में भांग-बूटी छानने वालों की कमी नहीं है। कभी गुलकंद के साथ बूटी छानी जाती थी लेकिन अब गुलकंद की जगह ठंडई ने ले ली है। होली के दिन सभी मंदिरों और घरों में तो ठंडई पीस कर बनाई ही जाती है। ठंडई के दुकानदार भी इस दिन कोई न कोई नया फ्लेवर जरूर पेश करते हैं। मिट्टी, मेवा, पान, सौंप, फूलों, फलों, गुलकंद, केसर की ठंडई खास तौर पर बनाई जाती है। सब फ्लेवर आज भी मिल जाते हैं लेकिन कसेरू की ठंडई अब दुर्लभ हो गई है।
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होली की बारात
बड़ी बाजार की होली बारात का न्योता बंट गया है। इस शादी कार्ड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव, उमा भारती, अरविंद केजरीवाल से लगायत विधायक अजय राय तक हर किसी को इज्जत बख्शी गई है। यहां की बारात रात में निकली जबकि मुकीमगंज की बारात शुक्रवार को सुबह गाजे-बाजे के साथ निकलेगी। गौरीगंज और औरंगाबाद से भी बारात निकलेगी, जिसमें औढरदानी शिव और उनके गण-प्रेत बाराती के रूप में शामिल होंगे। ये बारातें सांप्रदायिक एकता की मिसाल भी हैं।
चौंसट्ठी देवी का दर्शन
दिन भर होली के रंगों में सराबोर होने के बाद लोग गंगा स्नान करते थे। सफेद कुर्ता-पायजामा या धोती-कुर्ता पहनकर हाथ में गुलाल लिए चौंसट्ठी घाट पर चौंसठ योगिनियों का दर्शन करने जाते हैं। पहले पूरा शहर ही घाट की ओर उमड़ पड़ते थे। रास्ते में एक-दूसरे से होली भी मिलते थे। यह परंपरा आज भी कायम है। भले ही पूरा शहर न उमड़े लेकिन इतने लोग तो जरूर ही पहुंच जाते हैं कि बंगाली टोला की गलियों में लंबी कतार लग जाती है। योगिनियां भैरव की सहचरी हैं और शोक, वियोग और दंड से बचने के लिए लोग साल के पहले दिन ऐसा करते हैं।
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अस्सी वाला सम्मेलन टाउन हाल में
चकाचक बनारसी ने अस्सी चौराहे के शिष्ट कवि सम्मेलन को ऊंचाई बख्शी थी। इस कवि सम्मेलन हो हर साल प्रशासन रोकने की कोशिश करता था लेकिन चौसट्ठी देवी का आशीष लेने के बाद लोग चौराहे पर जुट जाते थे। भीड़ जुट जाती थी तो प्रशासन बेबस हो जाता था। उसके बाद कवि देश-दुनिया की नामचीन हस्तियों, हालात का अपने अंदाज में गुण-धर्म विश्लेषित करते थे। अस्सी से चलकर यह कवि सम्मेलन अब टाउन हाल मैदान तक पहुंच गया है। शुक्रवार को आयोजन की तैयारियां पूरी हो गई हैं।
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होली साहित्य में छाए मोदी
काशी में गुप्त साहित्य हर युग में जारी होता रहा है और आज भी छप रहा है। 50 से ज्यादा ऐसी किताबें, पर्चे बाजार में आ चुके हैं। हर किताब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और यूपी के सीएम अखिलेश यादव के गुणों का वर्णन है। आज के हालात पर तंज किया गया है। सांड बनारसी के साहित्य के प्रधान संपादक अमित शाह हैं जबकि स्थानीय संपादक मेयर रामगोपाल मोहले हैं। इसे इस्लामाबाद से छापा गया है। लोहटिया का भी साहित्य बाजार में आ गया है।