मजिस्ट्रेट एफबी गाबिंस ने मंदिर के पुजारी और कर्मचारियों को भी गिरफ्तार करवाया
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रवि प्रकाश सिंह
वाराणसी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पांच साल पहले ही काशी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बड़े जनविद्रोह की गवाह बन चुकी थी।1852 में फैली अफवाहों, धार्मिक भावनाओं से जुड़े फैसलों और शहर के पारंपरिक सुरक्षा द्वार तोड़े जाने के विरोध ने ऐसा उबाल पैदा किया कि हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे। अंग्रेज अफसरों को भीड़ ने दौड़ा लिया। पत्थरों से हमला किया गया और हालात संभालने के लिए फौज बुलानी पड़ी। पांच दिन तक चले विद्रोह को इतिहास में ‘गौरैया शाही’ के नाम से भी जाना जाता है। काशी की जनता भोसला घाट पर जुटी। उस समय काशी के मजिस्ट्रेट एफबी गाबिंस थे। मौके पर पहुंचकर कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया। मंदिर के पुजारी और कर्मचारियों भी गिरफ्तार हुए। इस बीच शहर में यह अफवाह तेजी से फैली कि जेल में बंद कैदियों को ईसाई बनाया जाएगा। वजह बताई गई कि जेल में शाकाहारी और मांसाहारी भोजन एक ही रसोई में बनेगा और कैदियों को एक साथ खाना परोसा जाएगा। कैदियों का धर्म भ्रष्ट होने की आशंका जताई गई। इस अफवाह ने लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया। विद्रोह के पीछे केवल धार्मिक अफवाह ही नहीं था। शहर में बनाए गए फाटकों को तोड़ने का अंग्रेज अधिकारियों का आदेश भी लोगों को नागवार गुजरा। ये फाटक मोहल्लों की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। दूसरा बड़ा मुद्दा वृषोत्सर्ग किए गए सांडों को पकड़ने का आदेश था। प्रशासन ने ऐसे सांडों को पकड़कर कांजीहाउस में डालने का निर्देश दिया था। हिंदू समाज ने इसका विरोध किया। मान्यता के अनुसार ऐसे सांड को बांधना धार्मिक रूप से निषिद्ध माना जाता था। इन सांडों की पीठ पर त्रिशूल के आकार का निशान दागकर उन्हें छोड़ दिया जाता था। काठियावाड़ और गुजरात के हिंदू भी ऐसे सांडों के लिए चारे की व्यवस्था के लिए धन भेजते थे। ऐसे में प्रशासन की ओर से उन्हें पकड़ने का आदेश धार्मिक भावनाओं से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बन गया।
क्यों पड़ा नाम ‘गौरैया शाही’? ‘गौरैया’ उस समय मिट्टी से बनी छोटी पाइप को कहा जाता था, जिसका इस्तेमाल गांजा पीने के लिए चिलम के रूप में किया जाता था। इसकी लंबाई करीब पांच सेंटीमीटर बताई जाती है। दो अगस्त को जब नाटी इमली में अंग्रेज अधिकारी गाबिंस भीड़ को समझाने पहुंचे और वार्ता विफल हो गई तब भीड़ ने कुम्हारों की दुकानों में रखी मिट्टी की ‘गौरैया’ उठाकर अंग्रेज अधिकारियों पर हमला कर दिया। इसी घटना के कारण इस जनविद्रोह को ‘गौरैया शाही’ कहा जाने लगा। काशी का यह पांच दिन का विद्रोह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें आम जनता ने अंग्रेज अधिकारियों का खुलकर विरोध किया। प्रशासन को फौज बुलानी पड़ी और कुछ मांगों को स्वीकार करना पड़ा। इतिहास के पन्नों में दर्ज ‘गौरैया शाही’ आज भी काशी के उस तेवर की याद दिलाती है, जब शहर की जनता ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने अपने धार्मिक विश्वास और अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की थी।