खोजवां के संतोषी माता मंदिर विवाद को लेकर मुहल्ले के लोग भी मुखर होने लगे हैं। इस मामले में धमार्थ कार्य मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने कहा कि मोहल्ले और मंदिर से जुड़े लोग प्रस्ताव देंगे तो मंदिर की संपत्ति को विश्वनाथ मंदिर न्यास में शामिल किया जा सकता है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला मंदिर से जुडे़ लोगों को ही करना है।
घटना के बाद मुहल्ले के लोगों ने आरोप लगाया कि अतर सिंह अपने सियासी रसूख और प्रभाव के चलते मंदिर पर कब्जा जमा रखा था। यहां तक कि मुहल्ले के किसी को भी मांगलिक कार्यक्रम मंदिर परिसर में नहीं करने दिया जाता था।
इस मामले में धमार्थ कार्य मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने कहा कि मोहल्ले और मंदिर से जुड़े लोग प्रस्ताव देंगे तो मंदिर की संपत्ति को विश्वनाथ मंदिर न्यास में शामिल किया जा सकता है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला मंदिर से जुडे़ लोगों को ही करना है।
खोजवां मुहल्ले के लोगों ने बताया कि राजस्थान के प्रभुनारायण पालीवाल ने वर्ष 1960 में तीन बिस्वा जमीन खरीदकर संतोषी माता और शिव मंदिर का निर्माण करवाया था। वर्ष 1995 के करीब प्रभु नारायण की मौत के बाद मंदिर परिसर की जमीन पर कब्जा शुरू हो गया। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद के सहयोग से स्थानीय लोगों ने मंदिर परिसर को कब्जेदारों से मुक्त कराया था।
इसमें अतर सिंह की भी मुख्य भूमिका रही। 90 के दशक में मुहल्ले के लोगों ने मंदिर में ट्रस्ट बनाया तो कब्जेदारों से मुक्त कराने में अतर सिंह और उसके भाई राजबहादुर की अहम भूमिका होने से दोनों भाइयों को सचिव बनाया गया था। मंदिर खाली होने के बाद धीरे-धीरे अतर सिंह ने मंदिर के पिछले हिस्से में गाड़ी सर्विस सेंटर और बर्तन का कारखाना खोल दिया था।
लोगों के विरोध के बाद कारखाना बंदकर अतर सिंह ने बड़ा गेट लगाकर ताला बंद कर अपना कब्जा जमा लिया था। मंदिर के पुजारी के कमरे में भी अतर सिंह अपना ताला बंद किया जो अभी तक बंद है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अतर सिंह मंदिर की जमीन पर बहुमंजिला इमारत खड़ी करना चाहता है।