शहर के पौराणिक कुंडों में सीवर बहाने से कहीं सड़न फैल गई है तो कहीं कूड़े-कचरे से जलतीर्थों को पाट दिया गया है। इसकी एक बानगी है लल्लापुरा में स्थित पितृकुंड। मान्यता है कि पितृकुंड में पूर्वजों की अस्थियां तरती हैं। वहां तर्पण-अर्पण और अन्य कर्मकांड के लिए श्रद्धालु आते हैं लेकिन अब इस कुंड के अस्तित्व पर ही संकट के बादल घिर गए हैं। मुहल्ले को लोग ही नहीं, नगर निगम के कर्मचारी भी इलाके का कूड़ा इसी कुंड में फेंक रहे हैं। समूचा कुंड जलकुंभी के जाल से ढक गया है। पानी तो दिखता ही नहीं।
पुराणों में इस प्राचीन तीर्थ नगरी को आठ कूपों और नौ बावलियों का शहर कहा गया है। ऋषियों, मुनियों ने जहां तप किए, वहां तीर्थ बन गए। काशी में कई पौराणिक कुंडों का अतीत ऐसी ही तपस्थलियों से जुड़ा रहा है। लल्लापुरा में स्थित पितृकुंड इन्हीं में से एक है। कहा जाता है कि गंगा के अवतरण के पहले से ही इस कुंड में पूर्वजों को तारने के लिए अस्थि विसर्जन के साथ ही तर्पण-अर्पण किया जाता रहा है। अब भी पितृकुंड में तर्पण-अर्पण के लिए भीड़ लगी रहती है लेकिन बदहाली की छाया ने इसे भी घेर लिया है।
घरों का गंदा पानी इसी कुंड में धड़ल्ले से बहाया जा रहा है। आसपास के इलाके के लिए यह कुंड कूड़ा डंपिंग की जगह बन गया है। दुर्दशा का आलम यह है कि वर्षों से पितृकुंड के जल का स्पर्श तो दूर, लोग दर्शन तक नहीं कर सके हैं। वजह है कुंड का जलकुंभी से ढका होना। कुंड के पास रहने वाले अच्छे खान कहते हैं कि सफाई के लिए कई बार श्रमदान कराया गया लेकिन जागरूकता की कमी और प्रशासनिक सहयोग न मिलने से हालात जस के तस हो जाते हैं।