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पिता ही हर शख्स के वजूद की पहली पहचान

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वाराणसी। बेमतलब सी इस दुनिया में वो ही हमारी शान है। किसी शख्स केवजूद की पिता ही पहली पहचान है। सच कहा है बेमतलब सी इस दुनिया में हर पिता अपने बच्चों की शान है। हर किसी के वजूद की पहली पहचान है। फादर्स डे पर पिता और उसके दिए गए संस्कारों को नमन करती नई पीढ़ी शब्दों के जरिए अपना प्यार जता रही है।
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पापा जब प्रधानाचार्य को लेकर मेरे कक्षा में आ धमके
पापा चाहते थे कि मैं पढ़ लिख कर एक अच्छा इंसान बनूं। इसको ध्यान में रखकर वो मेरे शिक्षा और संस्कार के प्रति जागरूक थे। मेरा पढने लिखने में मन नहीं लगता था। स्कूल से भाग कर सिनेमा देखना, दोस्तों के साथ घूमना-फिरना मेरी आदत में शामिल था। बहुत तरह से समझाते बुझाते। कुछ दिन तो ठीक रहता पर बाद में फिर वही पुराना ढर्रा। पापा थक हार के मेरे विद्यालय के प्रधानाचार्य से मिले और मेरे क्रिया कलापों से उनको अवगत कराया। प्रधानाचार्य ने पापा से दूसरे दिन विद्यालय आने के लिए कहा। मैं अपने कक्षा में दोस्तों से बातचीत में मशगूल था, तभी नजर पड़ी तो देखा कि पापा स्कूल के प्रधानाचार्य के साथ इंट्री कर रहे हैं। मामला समझते देर नहीं लगी। तब तक पापा ने इशारा किया, वो रहा मेरा बेटा... शरद। फिर क्या था प्रधानाचार्य महोदय शुरू हो गए, कान उमेठते हुए कहना शुरु किया, शर्म आनी चाहिए तुम्हें। तुम्हारे पापा तुम्हारे लिए क्या नहीं करते दिन रात कड़ी मेहनत कर के दो पैसा घर ले आते हैं और तुम हो कि पैसा चुराकर दोस्तों के साथ सिनेमा देखते हो। पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता। झूठ बोलते हो मां बाप से। चोरी करते हो। मैं रोने लगा। नहीं सर आगे से ऐसा नहीं करुंगा कभी नहीं । पापा की भी आंखें नम हो रही थीं। पर मैं उन्हें मन से विश्वास दिला रहा था। नहीं पापा नहीं। अब आगे से ऐसा नहीं होगा। नहीं होगा। जिंदगी में परिवर्तन का प्रथम संदेश यही से शुरू हुआ। आज आपको नमन करता हूं पापा। आप की मेहनत, ईमानदारी, संकल्प, कार्य के प्रति निष्ठा, दायित्वों के निर्वहन का पाठ जो आपने पढ़ाया है वो आजीवन याद रहेगा। डॉ. शरद कुमार, प्राचार्य
उस दिन की शिक्षा जीवन भर का सूत्र बन गई
बचपन में गंगा महोत्सव के दौरान मुझे तबले की प्रस्तुति देनी थी। जल्दबाजी में मैंने पायजामा का नाड़ा खोलने के चक्कर में उसमें गांठ लगा दी। कार्यक्रम जब समाप्त हुआ तो मुझे लघुशंका बहुत जोर से लगी थी। अब नाड़ा खुल ही नहीं रहा था, मंच से जैसे ही बाहर आया तो देखा पिताजी पं. विकास महाराज बाहर ही बैठे थे। मैंने कहा कि पापा नाड़ा नहीं खुल रहा है। तब पिताजी ने मुझे देखा और बोले कि आओ तुमको बताते हैं कि पायजामे का नाड़ा बांधा कैसे जाता है। यह तो जीवन का छोटा सा सबक था लेकिन शुरूआत से लेकर विश्वमंच पर संगीत के सफर में हर कदम पर पिताजी मार्गदर्शक की भूमिका में ही रहे। गुरु और पिता के रूप में उन्होंने केवल शिक्षा और संस्कार ही दिए हैं। ऐसा ही एक वाकया था जब मुझे जर्मनी में राष्टï्राध्यक्षों केसामने विश्व संगीत समारोह में प्रस्तुति देनी थी। मैं तो घबराया हुआ था लेकिन पिताजी व गुरु सरोदवादक पं. विकास महाराज ने कहा कि कुछ ऐसा बजाओ कि सुनने वाले को लगे कि यह तो उसका ही संगीत है। उस दिन की शिक्षा जीवन भर का सूत्र बन गई। बीस साल से पिताजी केसाथ विश्वभ्रमण कर रहा हूं। मैंने साज से ज्यादा जीवन का दर्शन सीखा है। -पं. प्रभाष महाराज, तबला वादक
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पिता जी से ही मिला समाजसेवा का संस्कार
बचपन से ही पिता जी को समाजसेवा करते देखा था। बचपन का वह संस्कार का बीज आज भी पल्लवित है। पिता विशेश्वर चंद्र अग्रवाल ने जीवन में सादगी व मेहनत की राह पर चलते हुए हमें हमेशा सिखाया है कि समाज की बेहतरी में योगदान देना चाहिए। वह हमेशा सिखाया करते थे कि जीवन में सच्चाई के रास्ते पर चलकर समाज के हर प्राणी से समर्पण की भावना से व्यवहार करना चाहिए। परिवार की अकेली लड़की होने के नाते प्यार तो खूब मिला लेकिन गलतियों पर डांट भी मिली। नौकरी के दौरान भी वह गरीब बेटियों को पढ़ाने के लिए पाठ्य सामग्री दान किया करते थे। उनके उसी कार्य से प्रेरणा लेकर मैंने गरीब बेटियों की शिक्षा के लिए स्माइल मुनिया की शुरुआत की। अंजलि बताती है कि पिताजी कहते थे दुखों में जो किसी का हाथ बंटाता है वही सच्ची समाजसेवा है। उन्होंने हमेशा यही सिखाया कि समाजसेवा हो चाहे अन्य कामकाज जुनून और जज्बे का होना जरूरी है। इसी से समाज सेवा बढ़ सकती है और सामुदायिक भावना भी उत्पन्न होती है। -अंजली अग्रवाल, समाजसेविका
पापा कभी नाराज होते हैं, कभी रूठते हैं और कभी दुलारते हैं
जीवन के गुजरे वर्षों में जाने कितनी ऋ तुओं से खट्टे-मीठे व्यवहारों के साथ उनका सामना हुआ होगा। धूप-छांव, ताप और नमी ने जीवन को कभी कठोर तो कभी सुगम राह दिखाई होगी। लेकिन पापा के अवस्थाजनित चंद कठिनाइयों को दरकिनार कर दिया जाए तो आज भी उनकी आवाज में गजब की बुलंदी है। व्यवसायिक पेशे से जुड़े होने के कारण ज्ञान का चरमोत्कर्ष उनके करीब रहकर महसूस किया जा सकता है। दुनियादारी सिखाने की उनकी चाह हम सबने शिद्दत से समझी है। कभी-कभी व्यावहारिकता का उनका पैमाना मौजूदा जमाने के हिसाब से भले फौरी तौर पर मंजूर न हो लेकिन स्वस्थ परीक्षण के बाद उनका अभिमत सत्य के करीब नजर आता है। पापा कभी नाराज होते हैं, कभी रूठते हैं और कभी दुलारते हैं। इन सभी स्थितियों में उनका पितृत्व ईमानदारी से हम सबके सामने उपस्थित रहता है। बीमारी में भी जिंदादिली उनकी आंखों में झलकती है। पापा देश-दुनिया के घटनाक्रम पर सटीक नजर रखते हैं लेकिन घर-परिवार में चल रहे बदलावों से भी बाबस्ता हैं। उनका हठी स्वभाव कभी-कभी हम सबको बालसुलभ लगता है लेकिन हमें पता है कि इस उम्र में फि र से बचपन जीने की लालसा बलवती हो जाती है। -पुष्पांजलि शर्मा, योग शिक्षिका
पिताजी से है शिष्य, पुत्र और मित्र का संबंध
मेरे पिताजी सितार वादक पंडित शिवनाथ मिश्र जी मेरे गुरू भी हैं। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि पिता और गुरु दोनों हमेशा मेरे साथ हैं। जब उनके साथ मंच साझा करता हूं तो वह एक गुरू की तरह ही बर्ताव करते हैं और जब वह घर पर होते हैं तो पुत्रवत स्नेह ही बरसता है। कभी मैं जब परेशान होता हूं तो वह एक मित्र की तरह ही मेरी परेशानियों को साझा कर लेते हैं। मुझे याद है कि आज तक पिताजी ने कभी डांट नहीं लगाई है और ना ही कभी उन्होंने किसी और शिष्यों को डांटा। उनका मानना है कि जो काम प्रेम से हो जाए तो उस काम को डांट लगा कर क्यों किया जाए। मैंने पिता जी के साथ हजारों प्रोग्राम पूरे विश्व में किए हैं लेकिन स्टेज पर हमेशा पिता जी का सितार वादन मुझे कुछ ना कुछ सिखाता ही है। मेरा पिता जी के साथ सम्बंध, शिष्य, पुत्र एवं मित्र जैसा है। -पं. देवब्रत मिश्रा, सितारवादक
पिता जी की डांट ने बना दिया आईएएस
1998 में सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सफल नहीं होने पर मैं निराश हो गया और अपना सामान लेकर दिल्ली से धनबाद पहुंच गया। असफलता से इतना निराश था कि सोच लिया अब घर के व्यापार को ही देखूंगा। सुबह घर पर बैठा था तभी पिता जी सामने आए बोले दीपू अचानक कैसे आ गए। मैंने कहा यह आईएएस मेरे बस का नहीं लगताए व्यापार में आपके साथ रहूंगा। इस पर वे बोले ये दुकान तुम्हारी नहीं है जो तुम फैसला करोगे। इसे मैंने अपनी मेहनत से तैयार किया है। आप वापस जाइये और अपने मेहनत से कुछ हांसिल कीजिये। पिता जी की फटकार के बाद मैं दिल्ली लौट गया और तैयारी में जुट गया। 1999 में फिर परीक्षा दी और सफल होकर 2000 बैच का आईएएस बना। अगर पिता जी ने सख्ती से नहीं गढ़ा होता तो शायद मैं यहां नहीं होता। मेरी सफलता में पिता का बड़ा योगदान है। -दीपक अग्रवाल, मंडलायुक्त
अनुशासन और संस्कार पिता जी की देन
बचपन से ही पिता जी ने जो अनुशासन का संस्कार डाला वह आज भी यथावत है। पिता जी पर पुलिस विभाग में होने कारण समय की पाबंदियां बहुत थीं और वही हम लोगों को विरासत में मिला। जिस ईमानदारी से उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया वही शिक्षा हम लोगों को दिया करते थे। पिताजी का कहना था कि कोई काम खराब नहीं होता है बस केवल ईमानदारी से होना चाहिए। अगर ईमानदारी से काम करोगे तो सफलता निश्चित मिलेगी। पढ़ाई हो, कैरियर हो या फिर राजनीतिक जीवन पिताजी ने सिर्फ हौसला ही बढ़ाया। गलत होने पर सख्त पिता की तरह डांट भी लगाई और प्यार से दुलारा भी। -डॉ. नीलकंठ तिवारी, राज्यमंत्री
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