लेखक और मशहूर दास्तानगो हिमांशु वाजपेयी ने कहा चाह गई चिंता मिटी मनुआ बेपरवाह, जिनको कुछ नहीं चाहिए वही शहंशाह...। कबीर भी कुछ ऐसे ही थे। बनारस की माटी, पानी, तासीर का ही कमाल है जिसने कबीर को गढ़ा। लहरतारा के तालाब से पंचगंगा की सीढ़ियों तक की यात्रा ने कबीर को संत कबीरदास बनाया।
उन्होंने जीवन की नश्वरता पर चोट की, आडंबर पर चोट की। यही वजह है कि आज भी जन-जन के मन में कबीर जिंदा हैं। वह रविवार को गुलेरिया कोठी में आयोजित महिंद्रा कबीर फेस्टिवल के आयोजन की शृंखला के तहत दास्तान-ए-कबीर सुना रहे थे। उन्होंने कहा कि कबीर को समझने और जानने के लिए उनकी लोकस्मृति के साथ संवाद जरूरी है।
श्रोताओं ने कबीर को मन में उतारा
उन्होंने किस्सागोई के जरिये संत कबीर के जन्म से लेकर मगहर तक की यात्रा को शब्दों में पिरोया। हिमांशु वाजपेयी ने संत कबीर के जीवन की कहानियों को इस अंदाज में सुनाया कि सुनने वालों ने कबीर को मन में उतार लिया।
वह कहते हैं कि जब कबीर चादर बेचने जाते हैं तो उन्हें उस गरीब की विवशता देखकर महसूस होता है कि जब दर्द की दौलत पास नहीं तो किस काम की यह शोसेबाजी...। अगर आप सक्षम हैं और किसी की मदद नहीं कर सकते हैं तो सब बेकार है। कबीर और प्रेम पर बोलते हुए कहा कि अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाय, गूंगे केरी सरकरा, खाइ और मुस्काय...।
कहा कि कबीर ने जिस तरह से आडंबर पर चोट की और अंत समय में मगहर चले गए।क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा, जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा...। कबीर कहते हैं काशी हो या फिर मगहर का ऊसर, मेरे लिए दोनों ही एक जैसे हैं क्योंकि मेरे हृदय में राम बसते हैं। अगर कबीर काशी में शरीर का त्याग करके मुक्ति प्राप्त कर ले तो, इसमें राम का कौन सा अहसान है। कबीर ने आम आदमी को समझाया है कि जिंदगी की चदरिया अनमोल है, उसमें घमंड की तलवार लगने से बचाना चाहिए।