संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में फर्जी प्रमाणपत्रों के मामले में मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपियों की नौकरी पर भी तलवार लटक रही है। एसआईटी द्वारा मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद अब नए सिरे से जांच होगी। अब सभी की निगाहें इस दिशा में होने वाली कार्रवाई पर टिकी है। फर्जीवाड़े का खुलासा छह हजार डिग्रियों की जांच के बाद हुआ। इसमें 1130 डिग्रियां जहां फर्जी मिली, वहीं 207 शिक्षकों के दस्तावेज में भी हेराफेरी मिली।
संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रमाण पत्रों के फर्जीवाड़े की जांच 2015 में एसआईटी को सौंपी गई थी। जिन लोगों के खिलाफ जांच की गई की गई थी। उसमें कुलसचिव विद्याधर त्रिपाठी व गंगाधर पंडा, उप कुलपति परीक्षा इंदुपति झा व योगेंद्र नाथ गुप्ता, सहायक कुल सचिव परीक्षा सच्चिदानंद सिंह, अधीक्षक कार्यवाहक उप सचिव कौशल कुमार वर्मा, सहायक कुल सचिव दीप्ति मिश्रा व महेंद्र कुमार, कार्यालय प्रभारी कृपा शंकर पांडेय, भगवती प्रसाद शुक्ला, मिहिर मिश्रा, हरि उपाध्याय, त्रिभुवन मिश्र, सिस्टम मैनेजर विजय मणि त्रिपाठी, कार्यालय अधीक्षक विजय शंकर शुक्ला, प्रोग्रामर मोहित मिश्रा और सत्यापन अधिकारी शशींद्र मिश्र के नाम शामिल हैं।
प्रमाणपत्रों के फर्जीवाड़े में प्रदेश के 75 जिलों में नौकरी कर रहे शिक्षकों की डिग्रियों का सत्यापन कराया गया था। फर्जी प्रमाणपत्रों के मामले में विश्वविद्यालय के 17 कर्मचारियों से पूछताछ की गई थी। एसआईटी ने 2016 में जांच में पाया था कि विश्वविद्यालय की 3000 लोगों को फर्जी मार्कशीट बेची गई थी।
यह मार्कशीट संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के नाम से जारी हुई थीं। 16 वर्षों का विवरण तलब कर एसआईटी ने वर्ष 1998 से 2014 के बीच संस्कृत विश्वविद्यालय की डिग्री पर शिक्षक बने अभ्यर्थियों का ब्योरा बेसिक शिक्षा विभाग से तलब किया था। विश्वविद्यालय में अभिलेखों के सत्यापन में भारी अनियमितताएं मिली थीं।
एसआईटी के एक अधिकारी ने बताया कि फर्जी डिग्री के मामलों में प्रदेश के विभिन्न जिलों में 40 से अधिक एफआईआर दर्ज है। यह एफआईआर उन शिक्षकों के खिलाफ भी है, जिन्होंने फर्जी डिग्री के सहारे नौकरी हासिल कर ली थी। एसआईटी ने सभी शिक्षकों की बर्खास्तगी के लिए शासन को पत्र भेजा था। शासन स्तर पर इन शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई लंबित है।