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आस्था: 300 साल से काशी में प्रह्लाद घाट पर भी विराजते हैं भगवान जगन्नाथ, तीन दिन तक होते हैं खास महाअनुष्ठान

Wed, 03 Jul 2024 03:48 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी

सार

Varanasi News: भगवान जगन्नाथ को छह से नौ जुलाई तक चार तरह के खास व्यंजनों का भोग लगेगा। छह को अंकुरित अन्न, सात को कढ़ी-चावल, आठ को इमिरती व नानखटाई और नौ जुलाई को नानखटाई व अमावट का भोग लगेगा। ये सभी व्यंजन प्रभु को प्रिय है।
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प्रह्लाद घाट स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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काशी में अस्सी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर के अलावा गंगा किनारे प्रह्लाद घाट पर भी भगवान जगन्नाथ विराजते हैं। ये मंदिर 300 साल से अधिक पुराना है। यहां पर भगवान की अचल प्रतिमा है। इसलिए रथयात्रा के तीनों दिनों के महाअनुष्ठान मंदिर में ही होते हैं। दर्शन करने के लिए भक्तों की भीड़ होती है।

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प्रह्लाद घाट स्थित मंदिर में भगवान जगन्नाथ के अलावा बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र की लकड़ी की करीब पांच फीट की प्रतिमा है। यहां भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की पूजा होती है। इलाके के लोग रथयात्रा पर दर्शन-पूजन करते हैं। 

यह मंदिर कितना पुराना है, इसका स्पष्ट उल्लेख तो नहीं लेकिन वहां के बुजुर्गों का मानना है कि यह मंदिर तीन शताब्दी से अधिक समय से स्थापित है। मंदिर के प्रमुख पुजारी अभिषेक पांडेय ने बताया कि ये मंदिर पहले पत्थर से बना था। 2013 में इसकी मरम्मत कराई गई। 300 साल से अधिक पुराने इस मंदिर में मेरे दादा जी के दादा अयोध्यानाथ पांडेय के समय से पूजन और अनुष्ठान हो रहे हैं। ये पांचवीं पीढ़ी है।

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हर 12 साल पर बदल जाती है प्रतिमा
अयोध्यानाथ के पुत्र शिवशरण, पोते जगन्नाथ, इनके बेटे नारायण पांडेय ने जीवनभर मंदिर के प्रधान पुजारी की जिम्मेदारी संभाली। अभिषेक पांडेय ने बताया कि पूर्णिमा स्नान से बीमार पड़े भगवान जगन्नाथ को रोज काढ़े का भोग लग रहा है। छह जून की शाम को प्रोक्षण विधि से पूजा कर भगवान का आह्वान किया जाएगा। 

इसके बाद आम भक्तों के लिए दर्शन-पूजन शुरू हो जाएगा। सात से नौ जून तक रथयात्रा मेला लगेगा। इस मंदिर में भगवान पुरुषोत्तम और शालिग्राम का भी विग्रह है। वहीं, ब्रह्माघाट पर भी भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की छोटी प्रतिमा स्थापित है। यहां भी रथयात्रा पर दर्शन-पूजन होता है।

भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की प्रतिमा लकड़ी होती है। हर 12 साल बाद उनकी प्रतिमा बदल जाती है। पं. अभिषेक पांडेय ने बताया कि नई प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठा के बाद स्थापित होती है। मेरे पिता जी ने ये प्रतिमा 2013 में बनवाई थी। अब अगले साल ये प्रतिमाएं बदली जाएंगी। प्रतिमा नीम, चंदन और बेल की लकड़ी से बनती है। ओडिशा के कारीगर इन्हें बनाते हैं।
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