सबसे ज्यादा दक्षिण भारतीयों की छूटती हैं ट्रेनें
बनारस स्टेशन के आरपीएफ और जीआरपी के अलावा कॉमर्शियल विभाग के अनुसार बनारस नामकरण के तीन साल बाद भी बाहरी यात्रियों की ट्रेनें छूट रही हैं। इनमें सबसे ज्यादा दक्षिण भारतीय हैं।
लंबे संघर्ष के बाद बदला नाम
बनारस स्टेशन का नाम हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत के साथ उर्दू में भी लिखा है। कई सामाजिक संस्थाओं के लंबे संघर्ष के बदौलत ही बनारस स्टेशन का नाम पड़ा। तर्क था कि मंडुवाडीह नाम शहर को नहीं दर्शाता है। वरिष्ठ पत्रकार एके लारी ने रेलवे बोर्ड और तत्कालीन रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा समेत अन्य को पत्र लिखा था।
मॉडल स्टेशन का मिल चुका है खिताब
वाराणसी-प्रयागराज रेलखंड के बनारस स्टेशन को माॅडल स्टेशन का भी खिताब मिल चुका है। 2014 के बाद स्टेशन पर तीन से बढ़कर आठ प्लेटफाॅर्म हो गए हैं। इसके अलावा द्वितीय प्रवेश द्वार बन चुका है और लगातार विकास कार्य जारी हैं।
बोले अधिकारी
ट्रेनों में रनिंग कर्मियों के जरिये यात्रियों को जागरूक किया जाता है कि भ्रम न रहे। बनारस और वाराणसी स्टेशन के अंतर को समझें। - अशोक कुमार, जनसंपर्क अधिकारी, पूर्वोत्तर रेलवे वाराणसी मंडल