परिवारवालों ने जवान बेटे की तलाश में कोई कसर नहीं छोड़ी। काफी प्रयास के बाद सत्यप्रकाश जब नहीं मिले तो घरवालों ने उम्मीद छोड़ दी। सोमवार की दोपहर 25 साल बाद अपने बड़े भाई को देखते ही सत्यप्रकाश के दोनों भाई लिपटकर रोने लगे। छोटे भाई रोशन ने बताया कि हम लोगों ने ही नहीं पूरे गांव ने भईया के मिलने की उम्मीद छोड़ दी थी। हिंदू धर्म के अनुसार कोई 25 साल तक नहीं मिले तो उसका श्राद्ध कर दिया जाता है। हम लोग भी भइया के श्राद्ध की तैयारी कर रहे थे।
भटकते हुए पहुंचे थे बनारस
सत्यप्रकाश भटकते हुए बनारस आ पहुंचे। रेलवे स्टेशन से वह चंदुआ सट्टी पहुंचे। सड़क के किनारे खड़े रहते। कोई कुछ देता तो खा लेते, नहीं तो बिना खाए ही कई दिन गुजर जाता। कई बीमारियों ने उनको घेर लिया। सड़क किनारे पड़ा देखकर किसी ने अपना घर आश्रम को इसकी जानकारी दी।
वह लोग पहुंचे और सत्यप्रकाश को आश्रम ले गए। देखभाल शुरू हुई तो बीमारियां ठीक होने लगीं। उनकी याददाश्त भी सुधरी तो उन्होंने आश्रम वालों को घर के बारे में बताना शुरू किया। आश्रम वालों ने सत्यप्रकाश के बताए पते पर संपर्क किया तो एकबारगी परिजनों को विश्वास ही नहीं हुआ।
तीन और परिवार वालों को मिलाया
सोमवार को सत्यप्रकाश के परिवार जैसी खुशी तीन और परिवारों को मिली। आश्रम से एक ही दिन सभी लोगों की विदाई हुई। इसमें आजमगढ़ के फुतोलीगांव के 80 वर्षीय सच्चिदानंद उपाध्याय कई साल बाद अपनी पत्नी से मिले। गाजीपुर के श्रीकृष्णा और कोलकाता के अतुल का भी परिवार वालों से मिलन कराया गया।