सीख गए तो अपना पेट भर सकेंगे। हालांकि वह यह भी कहता है कि मूर्तियां अब ज्यादा नहीं बिकती हैं। ऐसे में सिलबट्टे बनाते हैं तो दो जून की रोटी का जुगाड़ हो जाता है। बनारसी के खिचड़ी बाल उसके अनुभव को बयां करते हैं। वह कल्पनाओं में नहीं जीता। हकीकत को गहरे से समझता है। यही वजह है कि वह अपने बच्चों को पढ़ाने के बजाय इसी पैतृक हुनर को सिखाता है।
अब थोड़ा आगे बढ़ा तो मुन्ना लाल और अशोक कुमार से मुलाकात होती है। वह भी सड़क से गुजरते वाहनों के के शोरगुल से बेपरवाह पत्थरों को तराशते हुए दिखते हैं। वह भी बनारसी की बात को दोहराते हैं। कहते हैं श्रीराम की मूर्ति की मांग बहुत कम है। वह भी इसके पीछे की वजह नहीं बता पाते। कहते हैं कि सबसे ज्यादा तो आंबेडकर की मूर्तियां बिकती हैं।
हालांकि वह आंबेडकर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखते। कहते हैं कि हमें इस बात से क्या मतलब कि कौन क्या है। हां, कोई मूर्ति बिकती है तो उन्हें दो पैसे मिल जाते हैं। यही संतोष की बात है। उन्होंने किसी से यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि आंबेडकर कौन हैं और उनकी मूर्ति कोई क्यों खरीद रहा है। कहते हैं कि कोई बड़ा नेता है बाबू जी। हां गांधी के बारे में वह जरूर जानते हैं। कहते हैं कि गांधी बाबा की मूर्ति भी ठीक-ठाक बिकती है।
इसी क्रम में तूफानी लाल शर्मा, मुन्ने आदि से भी मुलाकात होती है। देव मूर्तियों को आकार देने वाले उन मूर्तिकारों के जीवन की स्याह सच्चाई यह भी है कि उनके पास अपनी कोई जमीन नहीं है। जिस जमीन पर वह मूर्तियों को आकार देते हैं, वह लोक निर्माण विभाग की है। कहते हैं कि कई बार उन्हें वहां से हटने का नोटिस दिया जा चुका है। वह सरकार से जगह आवंटित करने के लिए करीब दस वर्षों से लड़ रहे हैं।
वह कहते हैं कि सरकार ने उन्हें लोहता से आगे जमीन देने का प्रस्ताव रखा गया है, लेकिन वह दस-बारह फीट जगह उनके काम के हिसाब से कम है। साथ ही वह इतनी दूर है कि वहां उनका कारोबार चल नहीं सकता। अगर सरकार चांदपुर चौराहे की मौजूदा जगह को ही उन्हें आवंटित करे तो उनका जीवन सार्थक हो जाए। कहते हैं वैसे भी इस जगह पर उनके दादा-परदादा भी काम करते आ रहे हैं। उनके बाप -दादा भी इसी जगह जन्मे और यहीं पर मर गए। उनका जन्म भी इसी स्थान पर हुआ।
सभी मूर्तिकार बड़ा सवाल उठाते हुए कहते हैं बाबू जी हम मूर्तियां बनाकर हिंदू आस्था को और मजबूत कर रहे हैं। ऐसे में क्या हिंदूवादी सरकार को हमें प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। वह मुख्यमंत्री की ओर से कुम्हारों के लिए आर्थिक मदद की योजना से भी अनजान हैं। जब उन्हें इस बारे में बताया तो कहते हैं कि मौजूदा समय में वह मिर्जापुर के अहरौला और चुनार से पत्थर मंगाते हैं, लेकिन बाजार में मारबल से बनी मूर्तियों की मांग ज्यादा है। सरकार मदद करे तो वह भी कुछ आधुनिक यंत्रों के साथ मार्बल की मूर्तियां बना सकते हैं। ऐसा होने पर उनकी जिंदगी में भी नया वसंत आ सकता है।