मणिकर्णिका कुंड से होता है यात्रा का आरंभ
पंचक्रोशी यात्रा का आरंभ मणिकर्णिका कुंड से होता है। कहा जाता है कि यह कुंड गंगा से भी प्राचीन है। उपाख्यानों ने इस कुंड को शिव, शक्ति और विष्णु से जोड़ते हुए हिंदू धर्म के तीनों संप्रदायों के लिए इसे महत्वपूर्ण बताया गया है। भक्त इस कुंड में डुबकी लगाकर अपनी अंजुली में पानी लेकर यात्रा करने का संकल्प करते हैं।
संकल्प लेकर भक्तगण नाव से अस्सी घाट की ओर बढ़ते हैं और यहीं से यात्रा का वास्तविक आरंभ होता है। इसके बाद कर्दमेश्वर, भीमचंडी, रामेश्वर, शिवपुर, कपिलधारा होते हुए मणिकर्णिका पर यात्रा का समापन होता है। लगभग 80 किलोमीटर की यह यात्रा श्रद्धालु पैदल ही तय करते हैं।
त्रेता और द्वापर के भी हैं प्रमाण
कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान राम ने अपने तीनों भाइयों और पत्नी सीता के साथ पंचक्रोशी यात्रा की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग रामेश्वर मंदिर में हैं। द्वापर युग में पांडवों ने यह यात्रा द्रौपदी के साथ की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग शिवपुर के पांडव मंदिर में हैं।