उन्होंने कहा कि खिचड़ी जब रसोई में पकती है, तो रोगी को निरोगी बना देती है, वही खिचड़ी जब दिमाग में बनती है तो निरोगी को रोगी बना देती है। किसी भी तरह की नकारात्मक सोच की खिचड़ी अपने मन में पकने न दें। अपने ख्वाबों का रंग दूसरों को न भरने दें, अपने पर विश्वास रखें और अपनी दिव्यांगता से ऊपर उठकर अपनी अपंगता को मात देकर एक खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान को कायम रखें। दीपा व्हीलिंग हैप्पीनेस के जरिये दिव्यांगों का जीवन संवारने के लिए कार्य कर रही हैं।
जीत चुकीं हैं कई अंतरराष्ट्रीय पदक
कमर में ट्यूमर के कारण वो 14 सालों में 183 टांके लगवा चुकी हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि पैरालाइज होने के बाद दीपा ने शॉटपुट के अलावा कई गेम्स में महारथ हासिल किया और हिमालयन रैली में भाग ले चुकी हैं। दीपा ने 2009 में शॉट पुट में अपना पहला कांस्य पदक जीता था।
इसके अगले ही साल उन्होंने इंग्लैंड में शॉटपुट, डिस्कस थ्रो और जेवलिन तीनों में गोल्ड मेडल जीते। गोला फेंक के अलावा भाला फेंक में उनके नाम पर एशियाई रिकॉर्ड है। खेलों के साथ दीपा को खेल रत्न, पद्मश्री अवार्ड, अर्जुन अवार्ड के साथ राष्ट्रपति रोल मॉडल अवार्ड-2014, लीडर एशिया एक्सीलेंस अवार्ड-2014, लिम्का पीपल ऑफ ईयर अवार्ड जैसे कई पुरस्कार हासिल कर चुकी हैं।