‘तबले पर दुनिया भर में मशहूर धिर...धिर...तिटकत की खास उठान अब नहीं सुनी जा सकेगी। करीब पांच हजार से अधिक गत-फर्द के दुर्लभ बोल भी हमेशा के लिए बनारसबाज के दिल में दफन हो गए। ताल की यह अनूठी बारीकियां न संरक्षित की जा सकीं न कोई सीख सका। तबले की दुनिया में पंडित लच्छू महाराज जैसा ताल गुरु पैदा होना अब मुश्किल है। इसलिए कि अब न तो वैसा रियाज रहा न बनारसबाज की परंपरा को जीने वाले लोग। पं. लच्छू महाराज जैसी थाप देने वाला फक्कड़ मिजाज न कोई था न कोई होगा।’ यह कहना है उनके करीबी शिष्य और जाने-माने तबला वादक पं. अशोक पांडेय का।
पं. लच्छू महाराज देश में तबले के ऐसे इकलौते कलाकार थे, जिनके पास पांच हजार से अधिक गत-फर्द का का अनूठा संग्रह था। वह गत-फर्द और उठान के सर्वश्रेष्ठ कलाकार थे। वह बढ़ैया की उठान के अलावा गत, फर्द बहुत खूबसूरत बजाते थे। एकल तबला वादन में उन्हें महारत हासिल थी। पं. अशोक पांडेय कहते हैं कि धिर धिर तिटकत... का बोल जो वह बजाते थे, उसे कोई दूसरा कलाकार कॉपी नहीं कर सका। ना धिं धिं ना... के बादशाह कहे जाने वाले पं. अनोखेलाल मिश्र के बाद खड़ी उंगली के बोल का जादू सिर्फ लच्छू महाराज के पास था।
ठुमरी गायक पं. छन्नूलाल मिश्र कहते हैं कि उनकी उठान में जो जान थी, वह किसी दूसरे कलाकार में नहीं थी। तबला वादक डॉ. प्रवीण उद्धव बताते हैं कि वह तबले के चारों घराने अजराड़ा घराना, बनारस घराना, फर्रूखाबाद घराना और लखनऊ घराने की बोल और विशेषता पर समान रूप से अधिकार रखने वाले कलाकार थे। 71 वर्ष की उम्र में भी उनके पास रियाज था और तैयारी भी। वह बनारस घराने के प्रसिद्ध तबला वादकों में पं. अनोखे लाल, पद्मभूषण पं. सामता प्रसाद गोदई महाराज, पद्मविभूषण पं. किशन महाराज की परंपरा के आखिरी कलाकार थे, जिनकी उंगलियों के जादू का असर भी था और संगीत जगत में दबदबा भी।
विख्यात तबला वादक पं. लच्छू महाराज का पार्थिव शरीर शुक्रवार की भोर में तीन बजे एपेक्स हॉस्पिटल से भोगाबीर वाले आवास पर लाया जाएगा। अंतिम संस्कार के लिए वहीं पर अर्थी सजाई जाएगी। घंटे भर बाद करीब चार बजे भोर में ही वाहन से पार्थिव शरीर लेकर परिजन दालमंडी वाले आवास पर पहुंचेंगे। उनके भतीजे सौरभ सिंह ने बताया कि दालमंडी आवास पर महाराज का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। सुबह आठ बजे अंतिम यात्रा निकाली जाएगी। मणिकर्णिका घाट पर अंत्येष्टि की जाएगी।
ताल गुरु पं. लच्छू महाराज अगर समय से अस्पताल पहुंच जाते तो उनकी जान बचाई जा सकती थी। तीन दिन लगातार कष्ट में रहने के बाद भी इस पीड़ा को उन्होंने न तो किसी से साझा किया न ही अस्पताल गए। यह कहना है 24 घंटे उनके साथ रहने वाले उनके शिष्य दीपक का। अंतिम समय एपेक्स हॉस्पिटल में लच्छू महाराज के साथ भतीजे सौरभ और दीपक ही थे। करीब चार वर्ष से लच्छू महाराज के साथ छाया की तरह रहने वाले उनके नेपाली शिष्य दीपक ने गुरुवार को उनके अंतिम दिनों के संघर्ष को ‘अमर उजाला’ से साझा किया। बताया कि 19 जुलाई को गुरु पूर्णिमा पर दालमंडी वाले आवास पर शिष्यों का जमावड़ा लगा था। गुरु जी ने शिष्यों को आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ने के लिए ईमानदारी से रियाज करने की सीख दी। इसके बाद सासाराम (बिहार) के कुछ शिष्यों का आग्रह था कि सासाराम में भी गुरु पूर्णिमा मनाई जाए। शिष्यों के आग्रह को वह ठुकरा नहीं सके और 21 जुलाई को सासाराम चले गए। 22 जुलाई की शाम को वह बनारस लौटे तो बुखार आ गया था। 23 जुलाई को वह दिन भर बुखार में तपते रहे लेकिन अस्पताल नहीं गए। फिर बुखार उतर गया और उनकी पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई। 26 जुलाई को अचानक उनकी तेज सांस चलने लगी। कई बार मैंने अस्पताल जाने के लिए कहा लेकिन वह मुझे चुप करा देते। कहते थे कि अरे बाबा... ऐसा अक्सर होता रहता है, डरने की कोई बात नहीं है। 27 जुलाई को उन्होंने भोगाबीर वाले आवास से दालमंडी जाने के लिए तैयारी की। घर से निकले तो सीने में चुभन की शिकायत कर रहे थे, पीठ में भी तेज दर्द हो रहा था। अंतत: चिकित्सक से कहकर उन्हें एक इंजेक्शन लगवाया गया था लेकिन अस्पताल का रुख उन्होंने नहीं किया। उनका इलाज करने वाले डॉ. अमित भास्कर ने भी परिजनों को बताया कि उन्हें सेवियर अटैक के बाद अस्पताल लाया गया था।