कार्तिक पूर्णिमा पर आयोजित होने वाली देव दीपावली पर काशी का वातावरण अद्भुत एवं अलौकिक होता है। शुक्रवार को पर्व को भव्य रूप से मनाने के लिए घाटों से लेकर शहर में तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गईं हैं। जगह-जगह फूलमालाओं और झालरों से सजावट का काम अंतिम दौर में है।
गंगातट पर उतरे देवलोक की छवि जैसी है काशी की देव दीपावली। दिवाली के 15 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को काशी में गंगा के अर्धचंद्राकार घाटों पर दीपों का अद्भुत जगमग प्रकाश 'देवलोक' जैसे वातावरण की सृष्टि करता है। पिछले 10-12 सालों में ही पूरे देश और विदेशों में आकर्षण का केंद्र बन चुका देव दीपावली महोत्सव 'देश की सांस्कृतिक राजधानी' काशी की संस्कृति की पहचान बन चुका है।
करीब तीन किलोमीटर में फैले अर्धचंद्राकार घाटों पर जगमगाते लाखों-लाख दीप, गंगा की धारा में इठलाते-बहते दीप, एक अलौकिक दृश्य की सृष्टि करते हैं। शाम होते ही सभी घाट दीपों की रोशनी में नहा-जगमगा उठते हैं। इस दृश्य को आंखों में समा लेने के लिए लाखों देशी-विदेशी अतिथि घाटों पर उमड़ पड़ते हैं।
देव दीपावली के आयोजन का शुभारंभ राज्यपाल राम नाईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद राजघाट से करेंगे। राजघाट पर आयोजन के बाद राज्यपाल और मुख्यमंत्री नौका विहार करते हुए अस्सी घाट पर देव दीपावली की छटा निहारेंगे। शासन की ओर से पहली बार 50 लाख रुपये का बजट जारी किया गया है।
अकेले काशी में मनाई जाने वाली देव दीपावली में देश-विदेश से कई लाख लोग आते हैं। आयोजन की तैयारियां कई माह पूर्व शुरू हो जाती हैं लेकिन एक दिन पहले तैयारियां दिन-रात की जा रही हैं। पुलिस की ओर बैरिकेडिंग करा दी गई है। पहली बार काशी के 84 घाटों पर अलग अलग आयोजन की तैयारी है।
1986 में पूर्व काशी नरेश स्व. डॉ. विभूति नारायण सिंह ने पंचगंगा पर हजारा दीप जलाकर देव दीपावली की शुरुआत कराई थी। प्राचीन दशाश्वमेध घाट पर सबसे पहले आरती की शुरुआत 1991 से हुई है। 14 नवंबर, 1997 से गंगा आरती प्रतिदिन की जाने लगी।