वाराणसी। बरसात और प्रेम का गहरा नाता है। आषाढ़ जब बरसता है तो यह बादलों का पृथ्वी से प्रेम का माध्यम है। वह तप्त धरा को अपनी शीतल बूंदों से सुकून देता है। प्रकृति का यह संगीत जब उपजता है और दिल तक पहुंचता है तब हर मन इस प्रेम का साक्षी बनता है। बरसात जब मिट्टी को चूमती है तो उससे उठने वाली वह सोंधी खूशबू अद्भुत होती है। डॉ. म्हस्कर राग गौड़ मल्हार में गुनगुनाती हैं बलमा बहार आई, पिउ पिउ रटत पपिहरा, पिया के धुन सुनाए...। मेघ राग में निबद्ध रचना कजरा कारे कारे लागे अति प्यारे...। ये गीत कुछ ऐसा ही अहसास जगाते हैं। घटा छाई नभ मंडल, बरसे मूसलधार चहुंओर बिजली चमके गरजे मेह। आकाश में काली घटा छाई हुई है और मूसलाधार बारिश हो रही है। बिजली भी चमक रही है और बादल गरज रहे हैं। ऐसे में गौड़ मल्हार की इस रचना में बरखा ऋतु का जो संगीत है वह मन को बेहद हर्षाता है। वो कहती हैं कि दादुरवा के बोलने से बादल तो आ गए हैं और अब घर भी जाना है। पिया के बिना मेरा मन लरज रहा है। बारिश की तरह पिया का भी इंतजार रहता है। कुछ राग ऐसे भी होते हैं जो मल्हार से संबंधित तो नहीं होते लेकिन जब गाए जाते हैं तो वर्षा ऋतु का अहसास कराते हैं। राग केदार में निबद्ध दामिनी दमके, चमके री, बिन बादरा आज की सांझ...। नायिका कह रही है कि बिजली चमक रही है और बादल भी गरज रहे हैं लेकिन बरसात नहीं हो रही है। ये राग प्रकृति के बेहद करीब ले जाते हैं। बनारस घराने से संबद्ध डॉ. अर्चना म्हस्कर मूलत: महाराष्ट्र की रहने वाली हैं और बनारस की बहू हैं।
संगीत में परास्नातक और गोल्ड मेडलिस्ट हैं डॉ अर्चना
काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधिधारक डॉ. अर्चना पद्मभूषण पं. राजन-साजन मिश्र की शिष्या हैं। बीएचयू में संगीत से परास्नातक में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। वह शास्त्रीय गायन के साथ ख्याल, ठुमरी और उपशास्त्रीय संगीत की विधा में भी निरंतर साधनारत हैं।