वाराणसी। मंदिर और मठों से अध्यात्म का संदेश देने वाली काशी में गद्दी का विवाद बहुत पुराना है। पुश्तैनी गद्दियों से यजमानों के जुड़ाव की वजह से कोई भी इन गद्दियों और संपत्तियों को आसानी से छोड़ना नहीं चाहता। सैकड़ों धार्मिक स्थलों पर पारी की व्यवस्था भी है, इसके बावजूद यजमानी के विवाद आए दिन सामने आते हैं। तीर्थ पुरोहितों की मानें तो पूर्वांचल में लगभग तीन सौ मठ और मंदिर हैं, जहां गद्दी को लेकर विवाद चल रहा है। इसे देखते हुए कई मंदिरों में पारी की व्यवस्था की गई है।
शास्त्रों में ‘काशी गया’ के नाम से प्रसिद्ध पिशाचमोचन कुंड पर पितृपक्ष के दौरान आमदनी के लिए ही सबसे ज्यादा विवाद होते हैं। 15 दिनों तक त्रिपिंडी श्राद्ध और अर्पण-तर्पण के लिए लाखों श्रद्धालुओं आते हैं। पुरोहितों का कहना है कि मंदिर और मठ के महंत की गद्दी अधिकांश जगहों पर पुश्तैनी ही है। परिवार बढ़ने के साथ गद्दी के बंटवारे को लेकर विवाद शुरू हो गए। रोजगार का प्रमुख जरिया होने के कारण हर कोई इसे हथियाना चाहता है। कमाई ज्यादा होने, टैक्स से मुक्त और समाज में प्रतिष्ठा का पद होने के कारण मठ व मंदिरों की गद्दी पर हर कोई बैठना चाहता है। कुछ जगहों पर संत समाज ने विवाद सुलझाने के लिए पारी की व्यवस्था कर दी है। इसके चलते विवाद काफी कम हो गए हैं। जानकारों की मानें तो पूर्वांचल के एक मठ में शिष्य ने अपने गुरु की हत्या कर गद्दी हथिया ली थी। विवादों की संख्या भी कम नहीं है। कई मामले पुलिस तक पहुंचे भी हैं, लेकिन कई मामलों को मठ और मंदिरों में ही दबा दिया गया।
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गद्दी के लिए हत्या कराना दुखद है। धार्मिक स्थान की गद्दी हथियाने के लिए इस तरह के कार्य हो रहे हैं तो यह बेहद घृणित है। -डॉ. कुलपति तिवारी, महंत, काशी विश्वनाथ मंदिर
यह घटना निंदनीय है। गद्दी के लिए हत्या समाज में विकृति उत्पन्न करती है और भक्तों की आस्था पर चोट पहुंचती है। दोषी को दंड मिलना चाहिए। -रामेश्वर पुरी, महंत अन्नपूर्णा मंदिर
धार्मिक स्थान की गद्दी के लिए हत्या करना निंदनीय है। थोड़े पैसे के लिए इस तरह का कुकर्म करने वालों को सख्त से सख्त दंड मिलना चाहिए। -नवीन गिरी, कालभैरव मंदिर
समाज में इस तरह की घटनाएं विखंडन पैदा कर रही हैं। संपत्ति के लालच में हम धर्म भूलते जा रहे हैं। इससे समाज में कुरीतियों का बोलबाला होगा। -महंत बालक दास, पातालपुरी मठ
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15 दिनों का कर्मकांड कहीं हत्या का कारण तो नहीं
गया के बाद काशी में विमल तीर्थ के रूप में स्थापित पिशाचमोचन कुंड पर पितृपक्ष का महीना बेहद खास होता है। 15 दिनों तक जो कर्मकांड होते हैं, वह तीर्थ पुरोहितों के लिए वर्ष भर की कमाई का जरिया हैं। अधिकतर गद्दियां पुश्तैनी ही हैं। कृष्णकांत उपाध्याय की हत्या भी यही कारण है। पहले वह गद्दी स्वयं चलाते थे और उनका छोटा भाई कोचिंग चलाता था। पिता की मौत के बाद भाई ने गद्दी में हिस्सा मांगा और तभी से विवाद शुरू हो गया। बाद में गद्दी के बीच में दीवार पड़ गई, लेकिन विवाद कायम रहा।
हत्या के बाद पसरा है सन्नाटा
कृष्णकांत की हत्या के बाद उनके छोटे भाई राजेंद्र की गद्दी पर भी सन्नाटा रहा। यहां पुलिस तैनात कर दी गई है। वहीं कृष्णकांत की गद्दी पड़ोसी तीर्थ पुरोहित और उनके पुराने मित्रों ने संभाल ली है। बाहर से आने वाले यजमानों को निराश होकर न लौटना पड़े, इसलिए उनके मित्रों ने कर्मकांड की पूरी व्यवस्था की है। चेतगंज के रहने वाले साकेत राय ने बताया कि हम लोगों ने जब सुना तो विश्वास नहीं हुआ कि कृष्णकांत की हत्या हो गई। रमाकांत नगर के मिथिलेश श्रीवास्तव का कहना था कि पुलिस पहले चेत जाती तो आज परिवार को यह दिन नहीं देखना पड़ता।