वाराणसी। ऑनलाइन गेम्स की लत में फंसे युवा समय और पैसा तो गंवा ही रहे हैं, वह साइबर क्राइम से भी अंजान हैं। साइबर ठग गिरोह से जुड़े लोग ज्यादातर रात में ऑनलाइन रहते हैं और युवाओं को गेम खेलने के लिए रिक्वेस्ट भेजते हैं। ऑटो मैचिंग ऑप्शन की मदद से अनजान युवक-युवतियां एक-दूसरे से एक टीम में जुड़ते हैं। गेम का एक राउंड पूरा होने पर दूसरा राउंड खेलने के लिए नेट पैक या रिचार्ज खत्म होने की बात कर पैसे की मांग करते हैं। इसके साथ ही पर्सनल नंबर पर कॉल और व्हाट्सएप चैटिंग शुरू कर देते हैं।
बात बढ़ने पर प्यार भरी बातें कर गहरा संबंध बनाते हैं। साथ ही निजी जानकारियां भी हासिल कर लेते हैं। इसके अलावा कई बार फोटो और वीडियो वायरल करने की धमकी देकर दूर बैठे जालसाज युवक और युवतियों से ऑनलाइन पैसे की मांग करते हैं। गेम में खेलने के साथ ही वॉइस चैटिंग ऑप्शन से अनजान लोगों से बातचीत भी होती है।
इन नामों से सोशल मीडिया पर हैं हैकर्स
साइबर क्राइम एक्सपर्ट विजय श्रीवास्तव ने बतया कि पैसा लेकर यूसी, क्वॉइन और रॉयल पास उपलब्ध कराने वाले हैकर्स फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया साइट पर अपना एकाउंट बनाकर उपलब्ध हैं। इन साइट्स पर आसानी से युवाओं का संपर्क हैकर्स से हो जाता है। गेम खेलने वाले युवा यूसी, क्वॉइन और रॉयल पास (आरपी) खरीदने के लिए हैकर्स से संपर्क करते हैं। हैकर इसके एवज में रकम की मांग करता है और गेम की गिरफ्त में फंसे युवा पेटीएम या गूगल-पे से हैकर को पैसा देते हैं। रॉयल पास सेलर जैसे मिलते-जुलते नामों से कुछ जालसाजों की भी आईडी हैं, जहां संपर्क करने पर गेम खेलने वाला कई बार ठगी का शिकार हो जाता है। साथ ही पैसा जमा करने के बावजूद क्वॉइन और रॉयल पास नहीं मिल पाता।