केंद्र सरकार का दावा है कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट के अंतर्गत गंगा को पुनर्जीवन दिया जा रहा है। वाराणसी से लेकर गंगा सागर तक इसके घाटों की साफ-सफाई और इसकी तलहटी की सफाई कर इसके जल-जीवन में सुधार कर इसे जीवन और परिवहन की दृष्टि से दुबारा उपयोगी बनाया जा रहा है। लेकिन जल विशेषज्ञों और वाराणसी के प्रकृति प्रेमियों की चिंता है कि सरकार के कई प्रोजेक्ट गंगा के प्राकृतिक बहाव में बाधा पैदा कर रहे हैं। इससे वाराणसी में बहने वाली गंगा के अर्धचंद्राकार स्वरूप में बदलाव आ रहा है। इसके कारण गंगा के इकोसिस्टम में स्थाई बदलाव आने का खतरा भी है।
विशेषज्ञों की चिंता है कि गंगा के प्राकृतिक बहाव को बाधित कर किया जा रहा निर्माण गंगा के बहाव की दिशा को भी स्थाई तौर पर प्रभावित कर सकता है जिससे वाराणसी में गंगा का नैसर्गिक अर्धचंद्राकार स्वरूप सदैव के लिए प्रभावित हो सकता है।
इसके कारण एक सीमित क्षेत्र में गंगा के जल के रंग में स्थाई परिवर्तन भी आ सकता है जो यहां के जलीय जंतुओं के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है। सरकार को बड़े बदलाव करने के पहले इन बिंदुओं पर विचार करना चाहिए।
'काशी विचार मंच' पर अपना विचार व्यक्त करते हुए संकटमोचन मंदिर के महंत प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र ने कहा कि गंगा जीने का माध्यम हैं। गंगा की 2525 किलोमीटर लंबी जीवनधारा में बनारस में पड़ने वाला 5 किलोमीटर लंबा हिस्सा धर्म, अध्यात्म, संस्कृति और नदी की सेहत से लिहाज से बहुत महत्त्वपूर्ण है।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा के अद्भुत महत्व को समझकर ही 'गंगा कार्य योजना' का प्रारंभ 1986 में बनारस से ही किया था, लेकिन बाद की सरकारों ने योजनाओं का नाम बदलने और अवैज्ञानिक रास्तों पर चलने में दिलचस्पी ली। 2014 के बाद दीनापुर और सतवां में बने दो बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से वाराणसी की अशुद्धियों को दूर करने में कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं हुआ है।
उन्होंने कहा कि बनारस में गंगा की दो सहायक नदियां- असि और वरुणा - गंगा की धारा को नियमित करने और घाटों से गंगा की सिल्ट को हटाने का काम प्राकृतिक ढंग से करती रही हैं। अब इनके बीच नहर निकालकर गंगा के इकोसिस्टम के साथ खिलवाड़ हो रहा है जो मनुष्य को बहुत महंगा पड़ेगा।
इतिहासकार मोहम्मद आरिफ ने कहा कि गंगा को सिर्फ पैसे से साफ नहीं किया जा सकता। इसके लिए जनसहभागिता को प्रभावी बनाना होगा। उन्नीसवीं सदी के सबसे बड़े शायर गालिब ने गंगा और बनारस की पवित्रता से अभिभूत होकर ही इसे 'चिराग़-ए-दैर' अर्थात 'मंदिर का दीया' जैसी विलक्षण कृति की रचना की। अकबर और औरंगजेब ने गंगा के जल की सफ़ाई के लिए वैज्ञानिक नियुक्त किये थे। इसके औषधीय गुणों को पहचानकर ही इसे 'नहर-ए-बिहिश्त' यानी 'स्वर्ग की नदी' माना था।
पर्यावरण कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह ने विकास के तथाकथित मॉडल को विनाशकारी बताते हुए उसकी निंदा की। उन्होंने कहा कि बनारस को निडर होकर गंगा के साथ हो रहे खिलवाड़ के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा और इस अभियान को रोजाना गतिविधियों और नई सूझ के साथ जोड़ना होगा। बनारस सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों की ही नहीं, हमारी अंतर्राष्ट्रीयता की भी राजधानी है।
राजेन्द्र सिंह ने कहा कि मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री थे, उन्होंने हम लोगों के नेतृत्व में चले जनांदोलन के बाद हमसे बातचीत की और उत्तराखंड में बन रहे चार बांधों का निर्माण कार्य तत्काल हमेशा के लिए रोक दिया। लेकिन वर्तमान सरकार उनकी बात नहीं सुन रही है।
उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी ने सन 72 के पहले विश्व पृथ्वी सम्मेलन में स्वीडेन की संसद और राष्ट्रपति भवन के बीच बहती स्टॉकहोम नदी की सफाई से प्रेरित होकर गंगा से ही नदियों की स्वच्छता के एक अभियान का सूत्रपात किया था, जिसे 1986 में 'गंगा कार्य योजना' का रूप देकर राजीव गांधी ने अमली जामा पहनाया।
प्रियंका ने किया था संपर्क
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष विश्व विजय सिंह ने अमर उजाला को बताया कि प्रियंका गांधी जब पिछले दिनों निषादों के अधिकारों के लिए संपर्क कर रही थीं, तभी कई निषादों ने उनसे गंगा की दुर्दशा पर बात की थी। इसके बाद उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे गंगा के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए उनके आंदोलन को अपना समर्थन देंगी और उनके आंदोलन को आगे बढ़ाएंगी। उन्होंने कहा कि गंगा के पुराने गौरवमयी स्वरूप को वापस लाने के लिए उनकी पार्टी कृतसंकल्प है।