मिर्गी मस्तिष्क से संबंधित एक बीमारी है, लेकिन ‘किशोर बेटियों’ में ऐसे झटकों की शिकायत सिरफिरों की अभद्रता और राह चलते घूरने की वजह से बढ़ती पाई गई है। बीएचयू चिकित्सा विज्ञान संस्थान के न्यूरोलॉजी विभाग में डॉक्टरों ने कई लड़कियों को मिर्गी की दवा देकर बीमारी पर नियंत्रण की कोशिश भी की, लेकिन पिछले तीन वर्षों में जब बीमारी की दवा लेने वाली ‘बेटियों’ की संख्या दोगुनी हो गई तब संस्थान ने इसके कारणों का अध्ययन कराने का फैसला किया। इसके चौंकाने वाले परिणाम न्यूरोलॉजी विभाग में प्रस्तुत किए जा चुके हैं।
बीएचयू चिकित्सा विज्ञान संस्थान को मिर्गी से बचाव पर चल रहे अभियान के दौरान पता चला कि करीब 27 फीसदी रोगियों को डॉक्टरों द्वारा प्रारंभिक लक्षणों के आधार पर मिर्गी की दवाएं दी जा रही थीं, जबकि गहन जांच में
इन दवाओं की जरूरत महसूस नहीं हुई।
इन रोगियों में 80 फीसदी वे लड़कियां भी शामिल थीं जिनकी उम्र 13 से 18 वर्ष के बीच है। वर्ष 2012 में ऐसी ‘बेटियों’ की संख्या 228 थी, जो 2015 में बढ़कर 517 तक पहुंच गई। इन आंकड़ों के बाद कराए गए अध्ययन में ऐसे झटकों का आना ‘सिरफिरे’ लड़कों की तरफ इशारा करता पाया गया।
विभाग ने बीएचयू के छात्रों की टीम बनाकर इन झटकों के कारणों पर अध्ययन कराया। संस्थान के न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष ने भी इसकी पुष्टि की। 13 से 18 वर्ष तक की लड़कियों की काउंसलिंग में पता चला कि 34 फीसदी ‘बेटियां’ अभद्रता की शिकार हुई हैं, जिसमें उनके साथ छेड़खानी, गलत स्पर्श या राह में ‘सिरफिरों’ का घूरना शामिल है। 34 फीसदी बेटियां सोशल मीडिया अथवा फोन पर अभद्रता का शिकार हुईं जिनमें उन्हें गर्लफ्रेंड बनने का दबाव, फोन पर भद्दे संदेश या बार-बार मिस्ड कॉल करने की शिकायतें शामिल हैं। 32 फीसदी बेटियां शारीरिक व मानसिक दोनों तरह के शोषण का शिकार हुईं।