350 साल पहले हिंदू पूर्वजों ने इस्लाम धर्म अपनाया था। धीरे-धीरे इनकी पीढ़ियां बदलती गईं, आज यह लोग पांच वक्त के नमाजी हैं, पर हिंदू रीति-रिवाज निभाते हैं। शादी में हिंदुओं की तरह दुल्हनें लाल जोड़ा पहनती हैं। दउरी में पैर रखती हैं। हल्दी की रस्म और वरछेका भी होता है। भोज में यूपी-बिहार के धर्मांतरित मुस्लिम परिवार जुटते हैं।
मुगल शासक औरंगजेब के जमाने में करीब 350 साल पहले हिंदू पूर्वजों ने इस्लाम धर्म अपनाया। पीढ़ियां बदलती गईं। धीरे-धीरे इस्लाम में रच-बस गए। उनके दिन की शुरुआत अजान से होती है। पांच वक्त के नमाजी हैं लेकिन कुछ मुस्लिम परिवार आज भी हिंदू रीति-रिवाजों से खुद को बंधा महसूस करते हैं।
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नई दुल्हन जब ससुराल आती है तो परछावन और चावल फेंकने की रस्म होती है। इस्लाम में इसे नाजायज माना जाता है। हल्दी लगाना, माड़ो गाड़ना, वर छेका करने का रिवाज भी है। नवविवाहिताएं लाल जोड़ा पहनती हैं।
ससुराल में गृह प्रवेश के समय दउरी में पांव रखती हैं। माथे पर सिंदूर की जगह चंदन लगाना और ढोलक की थाप पर गीत गाने का भी चलन है। मुस्लिम महिलाएं साड़ियां तो पुरुष कुर्ता-धोती भी पहनते हैं।
गाजीपुर के दिलदारनगर क्षेत्र की ग्राम पंचायत उसिया की आबादी करीब 40 हजार है। गांव में मुस्लिम आबादी करीब 24 हजार है। रेलवे से सेवानिवृत्त ट्रांसपोर्ट निरीक्षक औरंगजेब खान का दावा है कि बहुत साल पहले फतेहपुर सीकरी से सैनूमल, पूरनमल और नरहरदेव गाजीपुर आए थे।
सैनूमल और पूरनमल कामाख्या धाम पर रुके थे, जबकि नरहरदेव ने कमिसरा डीह में अपना निवास बनाया। बाद में नहरदेव ने इस्लाम धर्म अपना लिया। कमिसरा डीह बाद में कमसार बना जिनमें 12 गांव आते हैं। हमारे वंशज नरहरदेव हैं जो कि भूमिहार और राजपूत समाज से आते हैं।
गांव के अलाउद्दीन खान बताते हैं कि हिंदू वंशज परिवारों से हमारा मेल-मिलाप आज भी है। रिश्तेदारियां नहीं हैं, लेकिन रिश्तेदार से भी कम नहीं हैं। कुछ मुस्लिम परिवार आज भी हिंदू रीति-रिवाज मानते हैं। समारोह होने पर घरों में नाच-गाना, ढोलक बजाना आज भी होता है। आसपास के 12-14 गांवों में धर्मांतरित मुस्लिम परिवार हैं।
व्यापारी रियाज खान कहते हैं कि उनका गोत्र सिकरवार है। उनके पूर्वज ठाकुर थे। वह दावा करते हैं कि उनके पूर्वज कुंअर नवल सिंह ने औरंगजेब के समय इस्लाम कबूल किया था। इसके बाद उनका नाम दीनदार खान हो गया।
इन्हीं के नाम दिलदारनगर बसा है। दीनदार खान के एक भाई धरनीधर सिंह के वंशज आज भी बिहार के समौता में रहते हैं। दोनों परिवार सुख-दुख में एक दूसरे के घर आते-जाते हैं।
भोज में जुटते हैं यूपी-बिहार के धर्मांतरित मुस्लिम परिवार
उसिया के निवर्तमान प्रधान शम्स तबरेज खां ने बताया कि हम लोग भूमिहार बिरादरी से धर्मांतरित हैं। साल-दो साल में सालाना भोज होता है। इसमें यूपी और बिहार के धर्मांतरित मुस्लिम जुटते हैं। कमसार से ही करीब 700 हिंदू और मुस्लिम शामिल होते हैं।
पिछली बार शेरपुर और रेवतीपुर में भोज हुआ था। इसका मकसद अपनी नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ना है। उनको बताना है कि भले ही हम आज हिंदू और मुसलमान हैं, लेकिन हमारे पूर्वज एक हैं। हम मुसलमान अपने अकीदे पर मजबूत हैं। नमाज पढ़ते हैं मगर पूर्वजों को नहीं छोड़ सकते हैं। बच्चों को यही सिखाया जाता है।
हम अपने पूर्वजों को नहीं बदल सकते: नसीम रजा
अल दीनदार शम्सी म्यूजियम एंड रिसर्च सेंटर के निदेशक डाॅ. कुंअर मुहम्मद नसीम रजा सिकरवार ने बताया कि कुंअर नवल सिंह ने 1678 में इस्लाम धर्म अपनाया था। मुगलकालीन दस्तावेजों के अनुसार, कैमूर क्षेत्र में राजकुमारी सिकरवार, 84 सिकरवार और कमसार सिकरवार जातियां हैं। इस क्षेत्र में धर्मांतरित मुस्लिमों के यही वंशज हैं। कुछ लोगों को अपने पूर्वजों के बारे में पता है और कुछ को नहीं।
20 साल से शोध कर रहे डाॅ. कुंअर मुहम्मद नसीम रजा भी अपने नाम में सिकरवार लिखते हैं। उन्होंने बताया कि गांव दिलदारनगर में 50 मुस्लिम परिवार हैं जिनके वंशज कुंअर नवल सिंह उर्फ दीनदार खां हैं। यहां के कुछ मुस्लिम परिवारों में हिंदू रीति-रिवाज आज भी चलते हैं। हिंदुओं में शादी की जो रस्में होती हैं उन्हें इस्लाम में नाजायज माना जाता है लेकिन हमारे पूर्वज हिंदू हैं, हम इस बात को भी नहीं बदल सकते हैं।
कार्ड पर लिखवाया था नौशाद अहमद दूबे
डॉ. कुंअर मुहम्मद नसीम रजा सिकरवार ने बताया कि जौनपुर जिले के डेहरी गांव के नौशाद अहमद ने अपनी बेटी के दावते वलीमा के कार्ड में नौशाद अहमद दूबे लिखवाया था। वह खुद को 1669 में जमींदार रहे लाल बहादुर दूबे की आठवीं पीढ़ी का वंशज बताते हैं। ये बात उन्होंने वलीमा के कार्ड में भी लिखवाई थी।