स्प्रिंगर में प्रकाशित शोध पत्र
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'द लिवर डॉक' के नाम से मशहूर डॉ. फिलिप्स ने ये गंभीर आरोप अपने एक्स हैंडल पर लगाया है। इन्होंने कहा है कि जिन रसायनों को कैंसररोधी और जीवाणुरोधी गुणों वाला बताया गया है वे अध्ययन में स्पष्ट नहीं हो रहे हैं। वहीं आंकड़ों के बीच में त्रुटियां, विरोधाभास और सांख्यिकी विश्लेषण की कमी दिख रही है। साथ ही कम नमूनों के इस्तेमाल से शोध कर दिया गया है।
डॉ. फिलिप ने रिसर्च पेपर प्रकाशित करने वाले जर्नल स्प्रिंगर नेचर की एथिक्स टीम और जर्नल के संपादकों को मेल किया है और एक्सप्रेशन ऑफ कंसर्न जारी करने और वैज्ञानिक प्रमाणों की जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि इसमें लैब के प्रदूषण को भी नजरअंदाज किया गया है।
कंप्यूटर सॉफ्टवेयर से पहचाने गए रसायनों की बिना पर्याप्त पुष्टि के गाय के मूत्र में औषधि मौजूद बताया गया जबकि ऐसे रसायनों का दावा करना जिनका जैविक रूप से मौजूद होना संदिग्ध या असंभव है। लेख के चैप्टर और डेटा तालिकाओं में विरोधाभास है। गलत या अप्रासंगिक संदर्भों का इस्तेमाल किया गया है।
इस शोध को डॉ फिलिप ने इसे थर्ड रेट पब्लिकेशन करार दिया है। इस रिसर्च में बीएचयू का बरकछा, मिर्जापुर का साउथ कैम्पस भी शामिल है। वहां पर बीएचयू का वेटनरी एंड एनिमल साइंस संकाय और गोशाला है। छह वैज्ञानिकों की टीम ने ये रिसर्च पूरा किया है।