यह मौलिक अधिकारों का भी हनन है। छात्रों का आरोप है कि हिंदी भाषी अभ्यर्थियों को केवल तीन से चार मिनट तक का ही समय दिया गया। छात्रों ने सामूहिक रुप से कुलपति पर दंडात्मक कार्रवाई कि मांग की है।
राष्ट्रपति को भेजी गई शिकायत पत्र के बारे में कोई जानकारी नहीं है। विश्वविद्यालय में यूजीसी और भारत सरकार के नियमों के अनुरुप ही नियुक्ति प्रक्रिया कराई जाती है। ऐसे में कुलपति पर तथाकथित भाषाई भेदभाव का आरोप लगाना गलत है। अभ्यर्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वो हिंदी के साथ पूछे जाने पर अंग्रेजी में भी उत्तर दें। विश्वविद्यालय को उत्कृष्ट बनाने में सहयोग दें।
डॉ. राजेश सिंह, पीआरओ, बीएचयू