राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि अद्याहम वाराणसेय नगरायाम भवताम मध्ये उपस्थिताम। उन्होंने कहा कि कालचक्र कहता है चरैवेति चरैवेति चलते रहो चलते रहो। आधुनिक युग में काशी की संस्कृत विद्वता की परंपरा का देश में आदर होता है। काशी विद्वत परिषद का निर्णय सर्वमान्य होता है। काशी को विशेष गौरव प्राप्त है। मुंबई में महिला ट्रेन चलाने का श्रेय राम नाईक को जाता है। सोमवार को बड़ा लालपुर स्थित दीन दयाल हस्तकला संकुल में राज्यपाल राम नाईक की संस्कृत अनुवाद में पुस्तक चरैवेति चरैवेति का विमोचन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। पुस्तक की पहली प्रति राष्ट्रपति को भेंट की गई।
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राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि चरैवेति चरैवेति का अर्थ चलते रहो। चलते रहो। जो बैठा है उसका भाग्य बैठ जाता है। जो चलता है उसका भाग्य चलता है। जीवन का संदेश चरैवेति है। आज मैं लेखक के रूप में राष्ट्रपति से अधिक बोलने के लिए समय मांगा। राज्यपाल ने कहा कि मुझे 1994 में कैंसर हो गया था लेकिन लोगों के शुभेच्छा से मैं ठीक हो गया। इस पुस्तक में विपक्ष कैसे काम करता है सत्तारुढ़ दल कैसे करता है। इसके बारे में बताया गया है। इसका अर्थ किसी पर टीका टिप्पणी नहीं है।
राष्ट्रपति लोकार्पण नहीं करते हैं बल्कि पुस्तक स्वीकार करते हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने हजारों पुस्तक प्रकाशित किए। पहली पुस्तिका 100 पन्ने की बापू की पुस्तिक का विमोचन हुआ। आज मेरी पुस्तक चरैवेति चरैवेति का विमोचन हुआ। संस्कृत में पुस्तक का प्रकाशन करने का निर्णय न्यास ने लिया। आज पुस्तक 350 रुपये में मिलेगी। वैसे पुस्तक की कीमत 500 रुपये है।
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो अभिराज राजेंद्र मिश्र ने किताब का अनुवाद किया है। 30 दिन में पुस्तक का संस्कृत में अनुवाद किया। इसकी एडिटिंग लखनऊ विश्वविद्यालय के संस्कृत के पूर्व प्राध्यापक राष्ट्रधर्म मासिक के संपादक प्रो ओम प्रकाश पांडेय ने की। इस पुस्तक की प्रस्तावना राज्यसभा सदस्य रहे डा. कर्ण सिंह ने लिखी है।
काशी में इसलिए कराया विमोचन
उनके पास गया तो उन्होंने पूछा कि आपकी पार्टी में संस्कृत जानने वाले बहुत लोग हैँ। फिर मेरे पास क्यों आए। मैंने कहा अभी मैं पार्टी का नहीं हूं। यह पुस्तक संस्कृत में है। देश के साथ साथ विदेश में संस्कृत के जानकारों के लिए लाभदायक होगा। गंगा तट काशी का सांस्कृतिक महत्व है। भारतरत्न पंडित मदन मोहन मालवीय महामना, राष्ट्ररत्न शिव प्रसाद गुप्त और संपूर्णानंद ने तीन विश्वविद्यालय की स्थापना कर सर्वविद्या की राजधानी के रूप में स्थापित किया।
विश्व का पहला विश्वविद्यालय काशी में है। इसलिए काशी में इस पुस्तक का विमोचन होना महत्व है। देश के पीएम काशी के हैं। इस मौके पर समन्वय सेवा ट्रस्ट हरिद्वार के अध्यक्ष आचार्य स्वामी अवधेशानंद गिरी ने इसकी प्रशंसा की। न्यास की ओर से सभी अतिथियों को पुस्तक रखने का सिंहासन दिया गया।
किताब की कहानी राज्यपाल की जुबानी
राज्यपाल व राष्ट्रपति
- फोटो : अमर उजाला
राज्यपाल ने कहा कि पुस्तक का जर्मन, सिंधी, बंगला, तमिल, पारसी और अरेबिक भाषा में अनुवाद करने का प्रस्ताव आए हैं। हर साल जो काम करता था उसका रिपोर्ट प्रकाशित करता था। किताब मैंने कभी नहीं लिखी। महाराष्ट की दैनिक सकार ने कहा कि आप लेख लिखे।
एक साल में 27 लेख हो गए तो लोगों ने कहा कि किताब बनाओ। यहां आनंद आए हैं। आगे आकर उन्होंने मराठी में प्रकाशन हुआ। मुंबई से तीन बार विधानसभा और पांच बार लोकसभा सदस्य रहा। मुंबई में सभी लोग रहते हैें। इसे हिंदी, गुजराती, उर्दू में किया गया। राजर्षि टंडन के दूबे जी ने कहा कि संस्कृत में किताब की आनी चाहिए। मैंने नहीं सोचा था लेकिन उनके कारण संस्कृत में अनुवाद हुआ।
काशी से महाराष्ट्र का गहरा रिश्ता
राज्यपाल ने कहा कि काशी के पंडित रागा भटट ने छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक किया था। महाराष्ट्र और काशी का गहरा रिश्ता है। पंचगंगा मणिकर्णिका अन्नपूर्णा भवानी मंदिर, दुर्गा घाट त्रिलोचन घाट का निर्माण मराठियों ने कराया है।
बाद में सिंधिया, भोंसले, होल्कर ने सिंधिया घाट भोंसले और अहिल्याबाई घाट बनवाया। बाद में अहिल्याबाई ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया है। दो माह पूर्व महाराष्ट् और यूपी के मुख्यमंत्री ने एमओयू किया है। विचारों और सांस्कृतिक व व्यापारिक लेनदेन के लिए एमओयू किया है।
राज्यपाल ने कहा कि विधायक के रूप में तीन बार के कार्यकाल में सबसे बड़ा काम दो माले शौचालय बनवाने की शुरुआत की। इसे वर्ल्ड बैंक ने इसे मान्यता दी। जगह नहीं होने वाले इलाकों में विधायक के रूप में सबसे बड़ा काम किया।
पांच बार सांसद रहते हुए पेट्रोलियम मंत्री रहा। चरैवेति में अनुभव लिखा है। पांच साल मैं पेट्रोलियम मंत्री रहने वाला एकमात्र व्यक्ति हूं। विपक्ष में रहकर मैनें दो तीन काम किया। मेरे प्रयास से राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत लोकसभा और राज्यसभा में गाया जाता है।
मेरे प्रयास से सांसद निधि पांच करोड़ रुपये निर्धारित की गई। बाद में इसे दूसरे प्रदेशों में अपनाया गया। मुंबई का नाम अंग्रेजी में बांबे, हिंदी में बंबई कहते थे। लोकसभा में उठाया तो बाद में हर भाषा में मुंबई किया गया। इसी प्रकार दूसरे जिलों का नामकरण हुआ। पत्नी और दो बेटियों को धन्यवाद देता हूं।