शास्त्रीय संगीत के साधक पं. मुकुंद विष्णु कालविंट जन्म शताब्दी समारोह के तहत शतकोत्सव संगीत समारोह में सोमवार को 100 कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। जानेमाने बांसुरी वादक पं. राजेंद्र प्रसन्ना ने बांसुरी पर प्राचीन रागों की अवतारणा से जहां वातावरण को उंचाई दी, वहीं देर रात अश्विनी भिड़े देशपांडेय ने सुरों की सरिता बहाकर संगीत प्रेमियों, गुणीजनों को निहाल कर दिया।
यह संगीत समारोह संगीत संस्था ‘शिल्पायन’ की ओर से आयोजित किया गया था। शतकोत्सव में संगीत प्रस्तुतियां सुबह से रात 10 बजे के बाद तक अनवरत चलीं। आरंभ वेदपाठ और गुरु वंदना से हुआ। इनके बाद शुभंकर डे ने राग मलय मारुतम की अवतारणा की।
विलंबित एकताल की रचना के बोल थे- सुनिए सुजान...। तबले पर संदीप राव केवले, हारमोनियम पर भइयन जी, तानपुरा पर जयंतिका डे ने संगत की। फिर दिल्ली से आए प्रसिद्ध बांसुरी वादक राजेंद्र प्रसन्ना ने बांसुरी पर राग बिलासखानी तोड़ी की अवतारणा की।
विलंबित एकताल के बाद मध्यलय त्रिताल में गत बजाकर उन्होंने वाहवाही बटोरी। इसके बाद राग शुद्ध सारंग और फिर भटियाली धुन बजाकर विराम लिया। तबले पर संगत की ललित कुमार ने। बांसुरी पर सहयोग में अतुल शंकर थे। देर शाम प्रो. राजेश शाह मंच पर आए।
उन्होंने सितार पर राग मारवा की अवतारणा की। विलंबित तीन ताल में मध्यलय की गत के बाद झाला की प्रस्तुति की। तबले पर संगत की पं. किशन रामडोहकर ने। देर रात मुंबई से आईं शास्त्रीय गायिका अश्विनी भिड़े देशपांडे ने राग मारू बिहाग की अवतारणा की।
विलंबित तीन ताल की बंदिश के बोल थे- रसिया हो न जायो ...इसके बाद द्रुत तीन ताल की बंदिश -तड़पत बीती रैन ... की प्रस्तुति की। इसके बाद दादरा ताल में कजरी -बरसे कारी रे बदरिया... को सुनाकर मुग्ध कर दिया। तबले पर विनोद गंगाधर लेले, हारमोनियम पर विनय मिश्र ने संगत की।
इस संगीत अनुष्ठान की पूर्णाहुति संयोजक एवं प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक देवाशीष डे के गायन से हुई। उन्होंने राग चंद्रकौंस में विलम्बित एकताल में बंदिश-बृज की नार... की प्रस्तुति की। तबले पर संगत की डॉ. प्रवीण उद्धव ने। अंत में समवेत स्वरों में शिल्पायन के 100 विद्यार्थियों ने राग भैरवी में मध्यलय एकताल में निबद्ध बंदिश पेश किया।