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चंद रुपये में मिल जाता है जानलेवा चाइनीज मांझा

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शहर में प्रतिबंधित जानलेवा चाइनीज मांझा चंद रुपये में मिल जाता है। यकीन न हो तो किसी भी पतंग की दुकान पर जाकर चाइनीज मांझा की मांग कर आजमाया जा सकता है। इसके बावजूद इस जानलेवा मांझा की बिक्री को लेकर जिला प्रशासन की सख्ती कागजों तक ही सीमित रहती है तो पुलिस ध्यान ही नहीं देती है।
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पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों की बात करें तो उनके अनुसार जिले में चाइनीज मांझा बिकता ही नहीं है। मगर, हकीकत यह है कि शहर भर में धड़ल्ले से इसकी बिक्री होती है। पतंगबाजी के शौकीन बड़े बुजुर्गों के साथ ही बच्चों के हाथ में भी चाइनीज मांझा आसानी से दिख जाता है। रोजाना इसकी चपेट में आकर आमजन के साथ ही पशु-पक्षी भी बुरी तरह घायल होते हैं, लेकिन इसकी बिक्री पर प्रभावी तरीके से अंकुश नहीं लग पा रहा है। गौरतलब है कि सितंबर 2018 में पांडेयपुर फ्लाईओवर पर ही चाइनीज मांझा की चपेट में आने से इलेक्ट्रीशियन मुन्ना (62) की मौत हो गयी थी। इसके साथ ही प्रत्येक वर्ष दर्जनों लोग इसकी चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल होते हैं। इन सबके बावजूद यह जानलेवा मांझा शहर भर में आसानी से उपलब्ध है।
दालमंडी में गुपचुप तरीके से मिलता है यह जानलेवा मांझा
चाइनीज मांझा शहर में उड़ती लगभग हर पतंग के साथ नजर आ जाता है। मगर, पतंग की दुकानों पर इसकी तलाश आसान नहीं होती है। दुकानदार बेहद गुपचुप तरीके से इसकी बिक्री करते हैं। दुकानदार चाइनीज मांझा उसी को बेचते हैं, जिन्हें वह जानते हैं या समझ लेते हैं कि उससे किसी तरह का खतरा नहीं हैं। दालमंडी की गलियों में 500 रुपये में एक परेती चाइनीज मांझा आसानी से मिल जाता है। हालांकि दुकानों पर बाहर देसी मांझा ही टंगा नजर आता है। इसी तरह से औरंगाबाद इलाका भी पतंग का बड़ा बाजार है। यहां भी चाइनीज मांझा आसानी से मिल जाता है।
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छापा पड़ने से पहले ही दुकानदार को मुखबिर दे देते हैं सूचना
दालमंडी, औरंगाबाद, नदेसर सहित शहर के जिन भी इलाकों में बड़े पैमाने पर चाइनीज मांझा बिकता है, वहां दुकानदार अपने मुखबिर भी तैयार खड़े रखते हैं। इन मुखबिरों का काम यह होता है कि पुलिस या प्रशासन का कोई शख्स दिखाई दे तो वह दुकानदार को तत्काल आगाह कर दें, ताकि वह अपना माल छुपा ले या फिर दुकान बंद कर इधर-उधर हो जाए। मुखबिरी करने वालों को रोजाना के हिसाब से 200 से 250 रुपये दिए जाते हैं।
चौकी इंचार्ज और बीट आरक्षी पैसा लेकर देते हैं संरक्षण
चाइनीज मांझा की बिक्री शासन स्तर से प्रतिबंधित है। एसीएम/एसडीएम और सीओ/थानेदारों को इसकी बिक्री पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके बावजूद चौकी इंचार्ज और बीट आरक्षी की मिलीभगत से इस जानलेवा मांझा की बिक्री धड़ल्ले से होती है। इसके बदले में दुकानदार प्रतिमाह के हिसाब से चौकी इंचार्जों और बीट आरक्षियों को तगड़ी रकम देते हैं। नतीजतन, जब कभी धरपकड़ का अभियान चलता है तो चौकी इंचार्ज और बीट आरक्षी ही अपने परिचित दुकानदारों को पहले से ही आगाह भी कर देते हैं।
इन इलाकों में धड़ल्ले से बिकता है चाइनीज मांझा
दालमंडी, औरंगाबाद, नई सड़क और नदेसर के साथ ही चाइनीज मांझा बड़े पैमाने पर मच्छोदरी, कोयला बाजार, नवाबगंज, लल्लापुरा, शिवाला, अर्दली बाजार, पंचक्रोशी, पांडेयपुर समेत कई इलाकों में धड़ल्ले से बिकता है। शहर में 600 से अधिक दुकानों से मांझा बिकता है। इनमें से कई दुकान थानों, चौकियों और पुलिस पिकेट के पास ही मौजूद हैं।
मकर संक्रांति के बाद जिले में नहीं चला प्रभावी तरीके से अभियान
मकर संक्रांति के समय को छोड़ दिया जाए तो इस साल अब तक जिले में चाइनीज मांझा के खिलाफ प्रभावी तरीके से अभियान नहीं चला है। इसके साथ ही पुलिस-प्रशासन ने किसी दुकान पर छापा भी नहीं मारा। देसी मांझा बेचने वाले दुकानदार बताते हैं कि चाइनीज मांझा ने उनके व्यापार की कमर तोड़ कर रख दी है। उधर, चाइनीज मांझा से पतंग उड़ाने वालों का कहना रहता है कि यह बेहद ही मजबूत होता है। गौरतलब है कि शहर में चाइनीज मांझा नई दिल्ली, बरेली और आगरा से आता है। इसके बाद बनारस से पूर्वांचल के अन्य जिलों में इसकी बिक्री की जाती है। जानकार बताते हैं कि चाइनीज मांझा से खुद की अंगुली कटने के साथ ही विद्युत तार के संपर्क में आने और करेंट की चपेट में आने का भी खतरा रहता है।
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