देश के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में शुमार बीएचयू में चंद छात्र जब चाहते हैं, अराजकता का नंगा नाच कर देते हैं। जब कार्रवाई की बात होती है तो एफआईआर होती है और जांच के एलान तक कार्रवाई सीमित रह जाती है।
परिसर में छात्राओं संग खुलेआम छेड़खानी हो रही है तो मारपीट, तोड़फोड़, और आगजनी की घटनाएं हर बार प्रशासन की लाचारी को बयां कर देती हैं। कार्रवाई के नाम पर विश्वविद्यालय प्रशासन ही असहाय नहीं दिखता, बवाल की चपेट में आने वाले लोग उफ करके ही रह जाते हैं।
उनकी शिकायत कहीं नहीं सुनी जाती है। तीन महीने में परिसर दो बार सुलग चुका है और अभी तक जांच के अलावा कुछ भी नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था के लिए दस करोड़ रुपये से अधिक का सालाना बजट है।
इसके तहत 600 सुरक्षा गार्ड, 40 से अधिक सुरक्षा अधिकारी, करीब 40 गनमैन गार्डों के अलावा 189 चौकीदार तैनात हैं। फिर भी बवाल होने पर परिसर में रहने वाले 20 हजार छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और कर्मचारियों के परिवारीजनों की सांसें थम जाती हैं।
सर सुंदरलाल अस्पताल में भर्ती मरीज, डॉक्टर और इनके तीमारदार बंधक जैसी स्थिति में पहुंच जाते हैं। माहौल खराब होने पर कोई न तो किसी को पहचानता है और न ही कोई किसी की मदद करता है।
यही नहीं, परिसर में एक दिन का बवाल आने वाले दो-तीन दिन तक डर के कारण छात्र-छात्राओं के पांव परिसर में आने से रोक देता है। परिसर स्थित विश्वनाथ मंदिर में रोजाना पांच हजार से अधिक श्रद्धालु बाहर से आते हैं और उन्हें रास्तों की जानकारी नहीं होती है। बवाल होने पर वह यहां से विश्वविद्यालय की दागदार छवि लेकर लौटते हैं।