वाराणसी शहर में भिखारी, साधु और कबाड़ी के भेष में घूम रहे लोगों की पहचान और सत्यापन पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। शहर के घाटों, मंदिरों, बाजारों और रेलवे स्टेशन के आसपास बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय हैं, लेकिन उनका कोई केंद्रीकृत रिकॉर्ड पुलिस के पास नहीं है। तीन महीने पहले बांग्लादेशी और रोहिंग्या के खिलाफ पुलिस ने जांच अभियान चलाया। जांच में कोई रोहिंग्या नहीं मिला, लेकिन जोन में 200 संदिग्ध प्रवासी पाए गए। कपसेठी में आठ ऐसे संदिग्ध मिले जिनके बताए पते पर पुलिस 70 दिन बाद भी नहीं पहुंच पाई। वहीं, घाट किनारे बंगाल, बिहार और दक्षिण भारत के भिखारी हैं, जो आते-जाते रहते हैं।
एक साल के अंदर शहर में चोरी और आपराधिक मामलों की जांच में कबाड़ियों की भूमिका सामने आने के बाद भी सत्यापन और डिजिटल रिकॉर्ड की प्रक्रिया अधूरी है। शहर के लंका, भेलूपुर और सिगरा में हुई चोरी की जांच में कबाड़ी वालों की भूमिका सामने आई थी। कबाड़ बटोरने के दौरान घर की रेकी की गई थी और बाद में चोरी की घटनाएं अंजाम दी गईं।
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वहीं, घाट किनारे बड़ी संख्या में मंदिर या घाट के आसपास साधु के वेष में घूमने वालों की कोई पहचान नहीं है। लंका थाने में दर्ज एक मामले में पुलिस विवेचना में सामने आया कि धमकी देने वाला आरोपी साधु के भेष में दशाश्वमेध घाट से केदारघाट तक का चक्कर लगाता था। दो महीने पहले चांदपुर में एक कमरे से 12 चोरी किए गए मोबाइल बरामद हुए थे।
मकान मालिक को पता ही नहीं था कि उसने चोर को कमरा दे रखा है, और न ही उसके पते का सत्यापन किया गया था। पते के अभाव में पुलिस भी चोर तक नहीं पहुंच पाई।