चैत्र नवरात्र 19 मार्च से शुरू हो रहा है। करीब नौ दशक बाद इस बार चैत्र प्रतिपदा की हानि के चलते अमावस्या तिथि में ही कलश स्थापना होगी। यानी चैत्र नवरात्र पुराने साल में ही शुरू होगा। ज्योतिषियों के अनुसार यह दुर्लभ संयोग है जब नवसंवत्सर के दिन प्रतिपदा तिथि की नहीं मिल रही है।
नवरात्र के शुभारंभ पर भक्त अपने घरों और मंदिरों में 15 तरह के नैवेद्य से पूजन कर कलश स्थापित करेंगे। मां नौ दिनों तक विराजमान रहेंगी। कलश स्थापना के तीन मुहूर्त मिल रहे हैं। चैत्र अष्टमी 26 को और नवमी तिथि 27 मार्च को मिल रही है। रामनवमी 27 मार्च को मनाई जाएगी। इस बार नए साल के राजा गुरु और मंत्री मंगल होंगे। माता का पालकी से आगमन होगा। नया विक्रम संवत 2083 एवं शक संवत 1948 होगा।
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काशी में चैत्र नवरात्र पहले दिन गायघाट स्थित मुखनिर्मालिका गौरी और शैलपुत्री माता के दर्शन पूजन का विधान है। सनातन धर्म में नया वर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से माना जाता है। इस बार एक संवत्सर का लोप होने से हिंदू नवसंवत्सर प्रतिपदा के बजाय द्वितीय तिथि से शुरू होगा। इस संवत्सर का नाम रौद्र संवत्सर होगा। वर्ष के आरंभ में चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा का तिथि का क्षय है।
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय और आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री ने बताया कि एक संवत्सर और तिथि के लोप से पुराने साल में ही नवरात्र की शुरुआत होगी। 19 मार्च को सुबह 6:40 बजे तक अमावस्या रहेगी। फिर प्रतिपदा तिथि शुरू हो जाएगी। इसके बाद ही मंदिरों और घरों में कलश स्थापना होगी। नौ गौरी के दर्शन पूजन होंगे।