नृत्य प्रस्तुत करतीं नगरवधुएं। (फाइल)
समिति के अध्यक्ष ने कार्यक्रम के वर्षों पुरानी परंपरा के बारे में बताया। कहा कि यह परंपरा राजा मानसिंह के जमाने से चली आ रही है। राजा मानसिंह द्वारा जब महाश्मशान नाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था। इस मौके पर राजा मानसिंह एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कराना चाह रहे थे, लेकिन कोई भी कलाकार इस श्मशान में आने और अपनी कला के प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं हुआ।
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मणिकर्णिका घाट पर नगर वधुएं (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
इस सूचना से राजा मानसिंह काफी दुखी हुए और यह संदेश उस जमाने में धीरे-धीरे पूरे नगर में फैलते हुए काशी के नगरवधुओं तक जा पहुंची। नगरवधुओं ने डरते-डरते अपना संदेश राजा मानसिंह तक भिजवाया कि यह मौका उन्हें मिलता है तो काशी की सभी नगरवधुएं अपने आराध्य संगीत के जनक नटराज महाश्मशानेश्वर को अपनी भावांजलि प्रस्तुत कर सकती हैं। राजा तैयार हो गए।
इस दिन से धीरे-धीरे यह उत्सवधर्मी काशी की ही एक परंपरा का हिस्सा बन गई। तब से आज तक चैत्र नवरात्रि की सातवीं निशा में हर साल यहां श्मशानघाट पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।