'शहर की सरकार' के लिए होने वाले चुनाव में भी जातिगत समीकरण अहम रोल निभाने जा रहा है। लंबे समय से निकाय चुनाव को लेकर मची हाय-तौबा धीरे-धीरे परंपरागत जातीय ताने-बाने की सियासत में ही फिट होती दिख रही है। मसलन विकास के दावे और स्थानीय मुद्दे हवा हो गए हैं। सड़क, बिजली, पानी के मसले गुजरे दिनों की बात हो चले हैं।
अब जातिगत आंकड़ों को ही साधा जा रहा है और उसी के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत लगाई जा रही है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव की भांति नगर निकाय चुनाव भी अंतत: जातिगत आंकड़ों के सहारे पर आकर टिक गए हैं। नगर निकायों की सीट का आरक्षण तय होने के बाद टिकट वितरण से ही हुई जातीय समीकरण सेट करने की शुरुआत अब तेज हो चली है।
बिजली, सड़क, पानी जैसी बुनियादी समस्याओं की अब चर्चा भी नहीं हो रही। मानो विकास की शर्तें और बातें लोग भूलते जा रहे हों। बानगी के तौर पर भदोही के ज्ञानपुर नगर पंचायत को लिया जाए तो यहां के निकाय चुनाव की आबोहवा भी पूरी तरह जातिगत वोटों के अंकगणित पर आधारित हो गई है। पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित सीट पर जातीय समीकरण के हिसाब से वोटों का हिसाब-किताब काफी महत्वपूर्ण माना जाने लगा है।
कुल 10079 मतदाताओं वाली इस नगर पंचायत में दो हजार से ज्यादा वैश्य और लगभग 1800 मुस्लिम वोटर हैं। इसके बाद कायस्थ और ब्राह्मणों के वोटों का आंकड़ा है। प्रत्याशियों को देखते हुए इन वोटरों के ध्रुवीकरण की गुंजाइश बन सकती है, लेकिन ब्राह्मण और कायस्थ वोटर पसोपेश में हैं।
इनको रिझाने का प्रयास सभी कर रहे हैं। लेकिन, मतदाता हैं कि अभी खामोश हैं। ज्ञानपुर नगर पंचायत में सबसे ज्यादा वोट वैश्य का है। इस बार निकाय चुनाव में बड़े राजनीतिक दलों के सिंबल देने का असर भी चुनाव पड़ना तय माना जा रहा है।
ज्ञानपुर नगर पंचायत
वोटों जातीय आंकड़ा (लगभग)
वैश्य 2100, मुस्लिम 1800, कायस्थ 1500, ब्राह्मण 900, मौर्या 450, रावत (बारी) 400, यादव 400, चमार-पासी 700, राजपूत 300, बिंद 100, पाल 250, अन्य 1000।