डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र
- फोटो : अमर उजाला
‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे जाने किस मछली में बंधन की चाह हो’ गीत के रचयिता और एक दर्जन से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र मानते हैं कि समय के साथ-साथ कविता और साहित्य के क्षेत्र में भी बदलाव आया है।
अब इसमें पहले जैसी संवेदनशीलता नहीं दिखती है। फेसबुक, व्हॉटसएप पर लिखी गई कविताओं में भी गंभीरता नहीं है। कहते हैं-इंटरनेट के युग में कवि तो बहुत हैं लेकिन कविता की प्रमाणिकता अगर कहीं है तो वह पुस्तकों में लिखी गई कविताओं में ही है।
देहरादून में रह रहे डॉ. मिश्र दो दशक तक वाराणसी में रह चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चार साल के कार्यकाल पर शनिवार को विमोचित पुस्तिका ‘मेरी काशी विकास के पथ पर... के संपादक मंडल में शामिल हैं।
रविवार को अमर उजाला कार्यालय में विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि कविता ओर साहित्य सृजन तीन तरह का होता है। पाठ्यपुस्तक तक जो कविता है, वह केवल गुरुजी जितना बता दिए वहीं तक रहती है।
मंचीय कविता कहीं-कहीं चैनलों पर दिखती है। इसमें कवि ताली बजाकर समर्थन मांगते हैं। कविता किसी के ताली बजाने से सार्थक नहीं होती है। तीसरा माध्यम फेसबुक वाले कवि है। वह और किसी को कवि मानते ही नहीं है।
मंच भी बदला और श्रोता भी बदले
कवि बुद्धिनाथ मिश्र
काव्य प्रेमियों की श्रद्धा कवियों में होती हैं। अगर कोई कविता में अपना रस ढूंढ ले तो यही बड़ी बात है। कहते हैं, पहले जब कविता सुनाई जाती थी तब इसको लेकर कटुता नहीं होती थी लेकिन जैसे ही वामपंथियों ने कविता को मुख्यधारा बनाकर अलग कर दिया, वैमनस्यता आने लगी।
डॉ. मिश्र मानते हैं कि 70 के दशक में जब कवि मंच से कविता सुनाता था तो 80 प्रतिशत श्रोता कविता को समझते थे, वह छंद और अलंकार को समझते थे। अब कविता का स्वरूप बदलता जा रहा है, इसमें किसी का जीवन संबंध नहीं होता है।
कविता और साहित्य में अब संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। डॉ. मिश्र का मानना है कि कवि सम्मेलन का मंच भी बदला और श्रोता भी बदल गए। जब तक रामधानी सिंह दिनकर, हरिबंश राय बच्चन, गोपाल दास नीरज मंच पर रहे, तब एक कविता का एक अलग आकर्षण रहा।
कुछ लोग मंच की कविता को लेकर व्यंग्य करते थे। हास्य कवि के नाम पर भी चुटकुले सुनाए जाते हैं और उसमें भी फूहड़ता आती गई। अब वह दौर नहीं है कि कोई कविता कहीं सुनाई जा सके।
हर कविता गाई नहीं जा सकती
गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र
हर कविता गाई नहीं जा सकती है, यह उसकी प्रकृति पर निर्भर करती है। अगर गाने लायक नहीं है और गाया जाए तो वह हास्यास्पद होती है। कविता लिखना साधना है, जब भी कोई कविता किताबों में लिखी जाती हैं तो उसमें गंभीरता रहती है।
जो साधन फिल्मी गीतों को मिल रहे हैं, वह साहित्य को नहीं मिल रहे हैं। कुमार विश्वास ने कविता की मार्केटिंग बता दी है। अब वह दौर है कि इंटरनेट से बचा नहीं जा सकता है। इंटरनेट ने युवा कवियों का काम आसान कर दिया है।
उधर, ‘मेरी काशी विकास के पथ पर...’ के बारे में डॉ. मिश्र का कहना है कि इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल से पहले के घाटों, शहर के सड़कों और सफाई आदि से संबंधित तुलनात्मक तस्वीरें होतीं तो अच्छा होता।
बावजूद इसके पुस्तिका बाहर से आने वालों के लिए सहायक होगी। इसमें शहर से जुड़ी हर अहम जानकारियों के साथ ही विकास कार्यों का पूरा जिक्र है। किताब के साथ ही इसमें इसका लिंक भी है, जिसे खोलकर पढ़ा जा सकता है।