ब्रह्मा, विष्णु, महेश संग कई प्राचीन दैवीय मूर्तियों में सिर्फ कला और मुद्राएं ही नहीं विज्ञान भी झलकता है। इन प्रतिमाओं को गढ़ने का एक निश्चित अनुपात और गणित होता था। इसकी शास्त्रों में विस्तार से चर्चा की गई है। सोमवार को ये बातें बीएचयू के वसंत महिला महाविद्यालय (राजघाट) में मूर्तिकला विशेषज्ञों ने कहीं। सोमवार को ‘भारतीय प्रतिमा विज्ञान’ पर विशेष व्याख्यान के दौरान ‘भारतीय प्रतिमा विज्ञान को समझना : पाठ और संदर्भ’ विषय पर संवाद हुआ।
कॉलेज के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग और क्वेस्ट ऑफ पास्ट की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में बीएचयू की प्रो. अर्चना शर्मा ने भारतीय मूर्तिकला और प्रतिमा विज्ञान के अंतर को बताया। कहा कि प्राचीन ग्रंथों के अनुसार देवी-देवताओं और अन्य आकृतियों के निर्माण के लिए निर्धारित अनुपात होता था। इसे ताल प्रणाली या तालमानम कहते थे। प्रतिमा विज्ञान में मुद्राओं की भूमिका बड़ी थी। मुद्राएं तीन तरह के होते हैं। हस्त, पद और शीश (हाथ, पैर और सिर)। उत्तम-दश-ताल से लेकर एक-ताल तक के मापदंडों का उपयोग ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कई देवियों, यक्षों और अन्य पौराणिक पात्रों की प्रतिमाओं को बनाने में किया जाता है।
समाज और धर्म का संगम है प्रतिमा विज्ञान
भारतीय प्रतिमा विज्ञान केवल कला नहीं है, बल्कि यह प्राचीन ग्रंथों और उनके सामाजिक-धार्मिक संदर्भों का एक गहरा संगम है। प्रतिमाओं की शारीरिक सुंदरता और उनके अनुपात इन शास्त्रीय नियमों पर आधारित होते हैं, जो भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिकता को दर्शाते हैं। संचालन डॉ. आकांक्षा ने किया। इस दौरान डॉ. सुशीला भारती, डॉ. संवेदना सिंह आदि मौजूद रहीं।