Varanasi News: बीएचयू में छात्रों ने शाही सिक्कों को स्पर्श कर उनकी खासियतें जानी। बीएचयू में आयोजित सात दिवसीय कार्यशाला में देश भर से मुद्राशास्त्री जुटे।
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काशी में गुप्त काल के महान राजा स्कंदगुप्त के चलवाए सिक्के मिले हैं। सिक्के बताते हैं कि काशी क्षेत्र में गुप्त काल के राजाओं और उनके कारोबार की बेहतर बसावट रही है। ये बातें बीएचयू में बृहस्पतिवार को सिक्कों की टकसाल तकनीक-लिपि को लेकर शुरू हुई सात दिवसीय कार्यशाला में ये जानकारी सामने आई।
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प्राचीन इतिहास, पुरातत्व और संस्कृति विभाग के प्रेमचंद सभागार में हजारों साल तक राजाओं के चलवाए शाही सिक्कों के हर पहलू से इतिहास के शोधार्थी और विद्यार्थी रूबरू हुए। कुषाण काल, गुप्त काल से लेकर मुगल सिक्कों के इतिहास और उनके बनाने की कला-तकनीक की बारीकियां सिखाईं गईं हैं। किताबी ज्ञान से उलट सिक्कों को स्पर्श कर उनकी लिपि और टकसाल तकनीक को समझा।
प्रख्यात मुद्राविद् स्वर्गीय प्रो. एके. नारायण की जन्मशती के मौके पर विभाग में उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग के सहयोग से प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया। इसमें पुरातात्विक और मुद्राशास्त्रीय धरोहर से संबंधित चित्रात्मक पैनलों को लगाया गया है।
विभागाध्यक्ष प्रो. एमपी अहिरवार ने भारतीय इतिहास के आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण में मुद्राशास्त्र के अहम बताया। आईआईआरएनएस, नासिक के पूर्व निदेशक अमितेश्वर झा ने कहा कि भारत में मुद्राशास्त्र के विकास में वैज्ञानिक तकनीक और कई विषयों का समावेश हुआ है। वहीं हिंदुजा फाउंडेशन के क्यूरेटर मनीष वर्मा ने बताया कि उनके पास 34,000 से ज्यादा सिक्कों के संग्रह के संरक्षण और संकलन किया है। भारतीय मुद्रा परिषद् के अध्यक्ष प्रो. पीएन सिंह ने विभाग सहित अलग-अलग शैक्षणिक संस्थानों को दिए जा रहे सहयोग, शोध गतिविधियों और शैक्षिक कार्यक्रमों को बताया।
इंडो-ग्रीक के 29 राजाओं का पता सिर्फ सिक्कों से ही चलता है
भारत कला भवन के असिस्टेंट क्यूरेटर डॉ. डीबी सिंह ने बताया कि वहीं भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे भी राजा रहे हैं जिनका पता न तो अभिलेखों से चलता है और न ही किसी साहित्य प्रमाण से। भारतीय यवन साम्राज्य के 29 राजाओं की जानकारी सिर्फ सिक्कों से ही होती है। यदि वे सिक्के हमें न मिलते तो भारत के इतिहास से इंडो ग्रीक राजवंश गायब ही हो जाता। सिक्कों से पता चलता है कि किस राजा का शासन कितना मजबूत या कमजोर था। मध्य काल में बहुत से राजाओं ने सिक्कों का निर्माण दोबारा करवाया। इससे यह माना जाता है कि वो काल खंड इस्लामिक दौर का था। उस काल के हिंदू राजा इतने सक्षम नहीं थे कि नए सिक्कों को जारी करें इसलिए पुराने सिक्कों का ही दोबारा निर्माण करवा दिया था।
वर्तमान में मुद्रा अवमूल्ययन की समस्याओं को गिनाया
मुख्य अतिथि मुद्राविद प्रो. कमल शील ने विभाग की पुरातात्विक परंपरा और डीन प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने वर्तमान समय में निम्न मूल्यवर्ग की मुद्रा के अवमूल्यन की समस्या को बताया। विभागाध्यक्ष, प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार मुद्राविद् प्रो. ओएन सिंह, प्रो. अमितेश्वर झा जैसे विशेषज्ञों ने भी छात्र और छात्राओं को सिक्के के हर पहलू को बताया। इस दौरान प्रो. पीके श्रीवास्तव, प्रो. अर्चना शर्मा, प्रो. सुजाता गौतम, प्रो. डॉ. अमित उपाध्याय, डॉ. उमेश कुमार सिंह मौजूद रहे।