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अतायस्तगंज के खेतों से मिली ललितासन मुद्रा में महेश्वर की मूर्ति

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वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पुरातन छात्र ने चंदौली जिले के साहबगंज कस्बे के अतायस्तगंज गांव में खेतों से 9वीं और 11वीं शताब्दी की मूर्ति और प्रतिमाओं को खोज निकाला है। इसमें ललितासन मुद्रा में माहेश्वर, शिवलिंग, उमा की प्रतिमाएं, अलंकृत स्तंभ, मृणठप्पा, खंडित बलुए प्रस्तर शामिल हैं। अतायस्तगंज के रहने वाले बीएचयू के पुरातन छात्र अरुण कुमार गुप्ता ने खेतों के बीच से इन मूर्तियों को निकाला है।
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प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विनोद कुमार जायसवाल व दृश्य कला संकाय के प्रो. शांति स्वरूप सिन्हा ने भी इन मूर्तियों और प्रतिमाओं की पहचान की है। डॉ. विनोद के अनुसार ललितासन मुद्रा में माहेश्वर की खंडित प्रतिमा मिली है। जिनका दाहिना पैर नंदी के पीठ पर है जो अपने आराध्य देव शिव को भक्तिभाव से देख रहा है तथा बायां पैर एक पीठिका पर है, चूंकि कटि से ऊपर का भाग खंडित है किंतु बायीं ओर माहेश्वर की मुद्रा व खंडित भाग के कारण कहा जा सकता है कि इनकी अर्धांगिनी उमा रही होंगी।
एक अन्य खंडित प्रतिमा जिनके किरिट करण्ड, केशद्ध, कुंडल, स्त्रियोचित चेहरा, भाव भंगिमा, बाएं हाथ में दर्पण लिए एक देवी अर्थात पार्वती की प्रतिमा हो सकती है। दूसरी खंडित प्रतिमा जो कटि से लेकर घुटने तक है। यह विशिष्ट अलंकरण से युक्त है। इसका अंग विन्यास सीधा है अत: किसी देवी की है न कि अप्सरा आदि की। इसके अलावा एक बड़ा सा छिद्रयुक्त अरघा है, जिसमें शिवलिंग को स्थापित किया गया है तथा कई छोटे-छोटे अरघायुक्त शिवलिंग भी मिले हैं। इस प्रकार यह संपूर्ण खंडित प्रतिमाएं किसी शिवमंदिर के भग्नावशेष प्रदर्शित कर रहे हैं। प्रतिमाओं के निर्माण शैली, अलंकरण, प्रतिमाशास्त्री अंकनो, लक्षणों के आधार पर इसे 9 वीं से 11 वीं शताब्दी के मध्य कालखंड का कहा जा सकता है। इसे मुगलों के समय हिंदू मंदिरों के तहस नहस के अभियान के समय ध्वस्त किया गया होगा।
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