साहित्यकार डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि आधुनिक हिन्दी के पितामह का जन्म 9 सितंबर 1850 को वाराणसी के चौखंभा मोहल्ले में हुआ था। इनका मूल नाम हरिश्चन्द्र था। भारतेंदु उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की संधि बेला पर खड़ा था।
बहुत बड़े समाजसुधारक थे भारतेंदु
बनारस बार के पूर्व महामंत्री नित्यानन्द राय एडवोकेट ने बताया कि भारतेंदु हरिश्चन्द्र बहुत बड़े समाज सुधारक थे। उन्होंने स्त्री शिक्षा के लिये कन्या पाठशाला की स्थापना की। सामाजिक कुरीतियों के विरूद्ध आंदोलन चलाया जब वे अग्रवाल समाज के चौधरी बनाए गए तब उन्होंने बतौर चौधरी आदेश दिया कि विधवा विवाह मान्य होगा।
यह घोषणा होते ही हङ़कंप मच गया। हालत यह हो गई कि अग्रवाल समाज की आनन-फानन में सभा बुलाई गई और भारतेंदु को चौधरी पद से हटा कर इनके भाई को चौधरी बना दिया गया। उन्होंने घोषणा को रद्द कर दिया।
हिंदी डिबेंटिग क्लब की स्थापना की
जिस वक्त देश मे लार्ड मैकाले की अंग्रेज परस्त व अंग्रेज दां बनाने की शिक्षा नीति देश पर जबरिया थोपी जा रही थी। उसी समय काशी में भारतेंदु ने हिंदी भाषा को व्यवस्थित किया। यही नहीं हिन्दी भाषा एवं देवनागरी लिपि को शासन में स्थापित कराने के लिए तमाम आंदोलन चलाए। हिन्दी डिबेटिंग क्लब के माध्यम से हिंदी का प्रचार प्रसार किया जिसमे सारे विवरण हिन्दी मे लिखे जाते थे।
हस्ताक्षर अभियान के थे प्रणेता भारतेंदु
देश से गोवध समाप्त करने के लिये साठ हजार हस्ताक्षर कराकर उस जमाने में दिल्ली दरबार के समय लार्ड लिटन को 1877 में भेजा था। इस प्रकार वे हस्ताक्षर अभियान जो लोकतांत्रिक मांगों के समर्थन में जो प्राय: लोकतांत्रिक पार्टियां चलाती है उसके प्रणेता थे।