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पुण्यतिथि विशेष, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां 'गंगा में स्नान करना हमारे लिए उतना ही जरूरी है जितना शहनाई बजाना'

Sun, 21 Aug 2022 02:50 PM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

शहनाई के जरिये सुबह ए बनारस में रंग भरने वाले बिस्मिल्लाह को आज भी गंगा का किनारा ढूंढता है। बनारस उनकी रूह में बसता था। वे पांच वक्त की नमाज भी पढ़ते तो देवी सरस्वती की उपासना भी उनके लिए जरूरी थी।
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बिस्मिल्लाह खां - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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नजीर बनारसी ने कहा था कि सोएंगे तेरी गोद में एक दिन मरके, हम दम भी जो तोड़ेंगे तेरा दम भर के, हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर-कर के...। बिस्मिल्लाह खां भी गंगा को अपनी मां मानते थे और कहते थे गंगा में स्नान करना हमारे लिए उतना ही जरूरी है जितना शहनाई बजाना। चाहे कितनी भी सर्दी हो गंगा में नहाए बिना सुकून ही नहीं मिलता।
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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां। - फोटो : अमर उजाला
शहनाई जिनके नाम से जानी जाती है, भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां कबीर की परंपरा वाले बनारस के सच्चे वारिस थे। सुबह ए बनारस की लालिमा में घुली हुई शहनाई की धुन 16 सालों से खामोश है। शहनाई के जरिये सुबह ए बनारस में रंग भरने वाले बिस्मिल्लाह को आज भी गंगा का किनारा ढूंढता है। बनारस उनकी रूह में बसता था। वे पांच वक्त की नमाज भी पढ़ते तो देवी सरस्वती की उपासना भी उनके लिए जरूरी थी।
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बिस्मिल्लाह खां
पोते नासिर ने बताया कि दादा जी बनारस से अपने रिश्ते के बारे में कहा करते थे कि यहां गंगा जी सामने हैं, यहां नहाइए, मस्जिद है, नमाज पढ़िए और बालाजी मंदिर में जाकर रियाज करिए। माता सरस्वती की उपासना करने वाले उस्ताद से जब सवाल पूछा गया कि शहनाई में आखिर इतनी मिठास कैसे है तो वह चेहरे पर बरबस ही मुस्कान बिखेरते हुए कहते थे कि हमने कुछ पैदा नहीं किया है, जो हो गया, बस ऊपर वाले का करम है। पूरी जिंदगी तो मंगलागौरी और पक्का महाल में रियाज करते हुए बीती है कहीं न कहीं तो शहनाई से बनारस का रस टपकना लाजमी है।
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