महंत राकेश पुरी के अनुसार मान्यता है कि भैरव को प्रसन्न किए बिना भगवान शिव की भक्ति नहीं होती है। काशी में रहने के लिए कोतवाल कालभैरव से इजाजत लेना है। भगवान श्रीकृष्ण ने पांडु पुत्र भीम को इंद्रप्रस्थ की रक्षा के लिए यहां तपस्या के लिए भेजा था। बाबा बटुकनाथ के प्रताप से इंद्रप्रस्थ की रक्षा हुई।
भैरव अष्टमी पर हुई अष्ट भैरव यात्रा
श्रीलाट भैरव काशी यात्रा मंडल ने कज्जाकपुरा स्थित श्री कपाल भैरव श्री लाटभैरव मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद अष्ट भैरव प्रदक्षिणा यात्रा शुरू की। धार्मिक वेश धारक किए भैरव भक्त नंग पांव, डमरू शंखनाद करते चल रहे थे।
कज्जाकपुरा से महामृत्युंजय महादेव में असितांग भैरव, त्रिलोचन घाट स्थित संहार भैरव, नखास स्थित भीषण भैरव, बटुक भैरव मंदिर में उन्मत भैरव, कमच्छा मंदिर में क्रोधन भैरव, दुर्गाकुंड के दुर्गा मंदिर में चंड भैरव, हनुमान घाट पर रुरु भैरव के साथ अष्ट भैरव प्रदक्षिणा यात्रा पूरी हुई। इसमें केवल कुशवाहा, गोविंद बाबा, नरेंद्र, जय प्रकाश राय आदि मौजूद रहे।