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बनारस मस्त है...पर सच मानिए तकलीफ में है

Wed, 08 Mar 2017 01:51 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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मंथ्‍ान (फाइल फोटो) - फोटो : SELF
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बनारस मस्त है...सुस्त है...मगर सच मानिए तकलीफ में है। इसलिए नहीं कि सामान्य सुविधाएं भी ठीक से नहीं मिलतीं या फिर वादों-दावों से उसे हर बार ठग लिया जाता है। धार्मिक, व्यवहारिक सिद्धांतों के प्रतिपादन का गौरव रखने वाली नगरी इतना बौना कैसे सोच सकती है। अमर उजाला के चांदपुर स्थित कार्यालय में 20 फरवरी से 6 मार्च तक चले मंथन कार्यक्रम में बनारसबाजों ने अपनी अकुलाहट को एक किस्से से बयां किया। लीजिए आप भी सुनिए....
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डॉ. संपूर्णानंद जी से किसी ने कहा, चुनाव सिर पर है...आप अपने लिए वोट और समर्थन मांगने क्यों नहीं निकल रहे। ...इस पर जवाब आया कि ‘अगर मैंने पांच साल जनता का सही मायने में खयाल रखा है तो फिर समर्थन मांगने जाने की क्या जरूरत है।...और अगर फिर भी जनता हमें वोट नहीं देती तो फिर ऐसी जनता से कुछ मांगने की भी क्या जरूरत है।’ यह पूरा किस्सा राजनीति, राजनेता और जनता के बीच संबंधों का ‘सिद्धांत’ बताता है। इसमें से जो पक्ष विमुख हुआ वो राजनीति, राजनेता और जनता तो नहीं हो सकता।

 11 दिन में प्रत्येक वर्ग से लगभग 250 विशिष्ट लोग मंथन में पहुंचे। मंथन को चर्चा के साथ खत्म करने के बजाए यह भी तय करना था कि यह लोग ‘जनता’ वाली भूमिका को ‘भागीदारी’ वाली कैसे बना सकते हैं। हमें उनकी चर्चा से कुछ सूत्र भी तलाशने थे, जो राजनीति को दिशा दें, राजनेता को दृष्टि और जनता को आनंदित कर सकें। बड़ी गंभीरता से पूरी भूमिका से साथ जब कुरेदा गया तो छिपाई जाने वाली घटनाएं बेधड़क कबूलनामे तक पहुंच गईं...एक पार्षद ने तो यहां तक कह दिया-‘दूसरों को क्या कहूं, मेरी पत्नी ही ऊपर खिड़की से गली में चुपचाप कूड़ा फेंक देती है।’ बस इसी की तलाश हमें भी थी..जिम्मेदारी निभानी थी...निभाई और आगे का आश्वासन है।
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