आठवीं मुहर्रम को शिया समुदाय के लोग कर्बला के अलमदार हजरत अब्बास के गम में डूबे रहे। चारों तरफ या सकीना..., या अब्बास... की सदाएं गूंजती रहीं और अजादारों ने दर्द भरे नौहे पेश कर इमाम हुसैन और उनके साथियों को खिराजे अकीदत पेश की।
सुबह लल्लापुरा स्थित ऐतिहासिक दरगाहे फातमान में कदीमी मजलिस में हजारों अकीदतमंदों ने शिरकत की। मौलाना सैयद जाफर रिजवी ने हजरत अब्बास की वफादारी पर रोशनी डाली। वहीं, दशकों पुरानी रिवायत के मुताबिक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब के पैतृक आवास पर कदीमी मजलिस हुई। मुर्तजा हुसैन शम्सी साहब ने मजलिस को खिताब किया। अंजुमन हैदरी (चौक) के अजादारों ने शहनाई की मातमी धुनों के बीच नौहाख्वानी की। यह मजलिस बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब की नजीर बनी, जिसमें हर तबके के लोग शामिल हुए।
बुधवार की शाम कच्ची सराय (दालमंडी) से उठा 40 घंटे का दुलदुल जुलूस अपने तयशुदा कदीमी रास्तों चौक, मुकीमगंज, प्रह्लादघाट, चौहट्टा से होता हुआ कच्ची सराय इमामबाड़े पहुंचकर ठंडा हुआ। हजरत अली समिति के सदस्य सलमान हैदर ने बताया कि बुधवार को दालमंडी, शिवपुर, शिवाला, दोषीपुरा और रामनगर समेत कई इलाकों में अलम, ताबूत और दुलदुल के जुलूस उठाए गए। अजादारों ने जंजीर और कमा का मातम किया। इस दौरान गंगा-जमुनी तहजीब के तहत हिंदू और अहले-सुन्नत हजरात ने जुलूसों का इस्तकबाल कर जगह-जगह सबील (पानी और शर्बत) का इंतजाम किया। रात 8:30 बजे चाहमामा इमामबाड़े से अलम और तुर्बत का ऐतिहासिक जुलूस निकला जो दरगाहे फातमान पर जाकर संपन्न हुआ।