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एक ‘भूत’ के कारण परेशानी में आजमगढ़ प्रशासन, हाईकोर्ट में रखना है पक्ष

Mon, 05 Mar 2018 02:13 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आजमगढ़
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जीवित होने के सुबूत दिखाते लाल बिहारी (फाइल) - फोटो : अमर उजाला
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एक ‘भूत’ ने आजमगढ़ जिला प्रशासन की परेशानी बढ़ा दी है। इस  ‘भूत’ प्रशासन पर 25 करोड़ के हर्जाने का मुकदमा किया है। प्रशासन को इस मामले में हाईकोर्ट में 13 मार्च को अपना पक्ष रखना है।

 भू-राजस्व अभिलेखों में मृत होकर पुन: जिंदा होने के बाद चर्चा में आए लाल बिहारी मृतक आज प्रशासन के लिए परेशानी का सबब बन गए हैं। प्रशासन की परेशानी पूर्व में हुए आदेशों के गायब होने से और बढ़ गई है। लाल बिहारी ने प्रशासन पर 25 करोड़ के हर्जाने का मुकदमा किया है। प्रशासन को हाईकोर्ट में 13 मार्च को अपना पक्ष रखना है। 
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निजामाबाद तहसील क्षेत्र के खलीलाबाद गांव निवासी लाल बिहारी मृतक का पुश्तैनी मकान खलीलाबाद में है। लेकिन वह मुबारकपुर थाना क्षेत्र के अमिलो गांव में रहते हैं। जब मृतक सात या आठ माह के थे तब उनकी मां परमी देवी ने मुबारकपुर थाना क्षेत्र के अमिलो निवासी रामकेर से दूसरी शादी कर ली।

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प्रशासन के अनुसार 1976 में लालबिहारी की चाची बरसादी देवी ने पतिराम बनाम लालबिहारी का मुकदमा तहसीलदार निजामाबाद की कोर्ट में दाखिल किया था। पतिराम बरसादी का बेटा है। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें..

लाल बिहारी मृतक - फोटो : अमर उजाला
तहसीलदार न्यायालय ने भूराजस्व अभिलेखों में लालबिहारी को मृतक दिखाकर जमीन को चचेरे भाई पतिराम और बाबूराम के नाम दर्ज कर दिया गया था। इसके बाद लालबिहारी को जब इसकी जानकारी हुई तो उसने खुद को जिंदा करने के लिए लड़ाई लड़नी शुरू कर दी।

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लेकिन 1994 में सीआरओ की जांच आख्या ने पूरे मामले को ही उलट दिया। इसका परिणाम हुआ कि मृतक को भू-राजस्व अभिलेखों में जिंदा कर दिया गया। लेकिन आज दोनों ही आदेशों की फाइलें गायब हो चुकी हैं।

निजामाबाद तहसील से गायब हुए अभिलेखों के मामले में तहसीलदार, लेखपाल सहित कई कर्मचारियों के ऊपर एफआईआर दर्ज हो चुकी है। लेकिन हाईकोर्ट से उन्हें स्टे मिला हुआ है। मुख्य राजस्व अधिकारी आलोक कुमार वर्मा ने बताया सीआरओ की जांच आख्या के अभिलेख गायब होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। 
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lal bihari - फोटो : अमर उजाला

 पूरे मामले में एसडीएम बागीश कुमार शुक्ल ने बताया कि निजामाबाद 1976 में लालबिहारी के पट्टीदारों ने मुकदमा दायर किया था।

जिसमें तत्कालीन तहसीलदार ने नियम जिसमें सात साल से लापता व्यक्ति को मृत माना जाता है, को ध्यान में रखते हुए उन्हें मृत दिखाकर जमीन उनके पट्टीदारों के नाम कर दी थी। लेकिन आज वह आदेश गायब हैं।

इस मामले में तहसीलदार, लेखपाल और अन्य कर्मचारियों के ऊपर एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी। उन लोगों ने हाईकोर्ट से स्टे ले रखा है। वर्तमान में ज्यादातर लोगों की मौत हो चुकी है। इसलिए अभिलेख कैसे गायब हुए यह कहना मुश्किल है।
 
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