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मेघ-मल्हार की बंदिशों में विरहिनी के लिए मेघ और प्रियतम दोनों एक समान

Tue, 25 Jul 2017 04:55 PM IST
amarujala.com, written by अनूप ओझा
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बनारस घराने की ठुमरी गायिका अबिरा मुखर्जी - फोटो : अमर उजाला
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लोक गीतों में प्रेम-माधुर्य,विरह पर आधारित कजरी का का प्रयोग सावन में घिरने वाली काली घटाओं के प्रतीक के रूप में किया गया है। मल्लार एक खास तरह की खुशी है। गांवों में धान की रोपाई करने वाली महिलाएं भी क्यारियों में मल्हार गाती हैं। झूले पर महिलाएं कजरी में भी उल्लास, उमंग के साथ विरह वेदना प्रगट करती हैं। बरखा ऋतु की मैं बचपन से ही मुरीद हूं।
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छतों से काले बादलों को निहारने का आनंद ही कुछ और होता है। सावन आए और सुरों में मल्हार न गूंजे ऐसा हो नहीं सकता। बनारस घराने की ठुमरी गायिका अबिरा मुखर्जी सावन को खुशहाली का संपदा बताती हैं। 

उमड़ घुमड़ बरखा आई छाई घटा घनघोर

रिमझिम परेला फुहार रे बदरिया घेरि आई ननदी.../ चहुंओर बरसेले कारी रे नजरिया/ बदरिया घेरि आइल ननदी/ भींजेले चुनरिया हमार रे बदरिया घेरि आई रे ननदी....। सनन सननन सन बहे पुरवइया/ दादुर मोर कोयलिया बोले ....बदरिया घेरि आऩनदी...। अबिरा मुखर्जी बर्षा झतु का बखान इस कजरी गीत से करती हैं। उनका कहना है कि सावन ही भिगोता और डुबोता है। सावन की फुहारें रस बनकर टपकती हैं।
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ऐसा प्राचीन बंदिशों के विरह वर्णन में मिलता है। सोचने की बात है कि आखिर सावन की इन बूंदों में कौन सा वो रस है जो मदमस्त कर देता है।  वह राग देस में बंदिश पेश करती हं- बूंद बूंद बरखा आई/पी पी पी पी पपीहा बोले/ पिया ना आए सजन घर/ उमड़ घुमड़ बरखा आई छाई घटा घनघोर..।
 वह पूरब अंग की ठुमरी के जरिए सावन की खुशी और टीस दोनों को व्यक्त करती हैं- बरसन लागी बदरिया रूम झूम के... बादर गरजे बिजुरी चमके बोलन लागी कोयलिया झूम झूम के....।  

अबिरा कहती हैं कि बादलों की आवाजाही के साथ ही पिया का रास्ता नायिका निहारने लगती है। संदेशा भेजने लगती है। पुकार लगाने लगती है। वह ठुमरी के जरिए इस भाव को ताजा करती हैं- हमरे संवरिया नहिं आए/ छाई घटा घनघोर/बादर चमके बिजुरी चमके डरपत जियरा मोर...।  

वह अपनी गुरु पूर्णिमा चौधरी की प्रिय बंदिश के जरिए इस सिलसिले को आगे बढ़ाती हैं- मग बिच करे बरजोरी श्याम श्याम सलोने संवरिया.../ औचक आए धाए बहियां धरि सिर की गगरिया फोरी../ बरबस मांगत दान दही को पकड़त पीछ पिछौरी.../ दे तारी मुस्काय सजीले एक ना मानत मोरी...।  वह बताती हैं कि मिर्जापुर-बनारस में सावन बहुत ही खास होता है।

इस सावन की बारिश के हर प्रकारों को गीतों में बहुत गहराई से रचा गया है। वह कजरी सुनाती हैं- कारी कारी झुकि आई रे बदरिया ना/ गोरी बगिया में गावेली कजरिया ना.../ एक त पिया परदेस दूजे भेजे ना सनेत तीजे रचि-रचि छापे छानी रंग चुनरिया ना../ आइल सावन के बहार सखिया गावेली मल्हार../ बोले पवनवा से अमवा की डरिया ना...। 
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प्रोफाइल
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अबिरा मुखर्जी 
घराना: बनारस 
गुरु: पूर्णिमा चौधरी, पं. देवाशीष डे,शुभ्रा गुहा 
गायन: ख्याल, ठुमरी, झूला, कजरी, चैती, होरी। 
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