उर्दू के अफसाना निगार कृष्ण चंद्र के चर्चित उपन्यास एक गधे की आत्मकथा पर आधारित नाटक सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, चमचागिरी और बाबूगिरी पर करारा व्यंग्य किया। अख्तर अली द्वारा लिखित नाटक एक गधे की आत्मकथा के मंचन ने समाज को सच का आइना दिखाया। नागरी नाटक मंडली के मंच पर शुक्रवार को अश्विन नाट्य महोत्सव में एक गधे के मंचन पर हास्य व्यंग्य के साथ ही समाज का सच भी पेश किया। सभागार तालियों से गूंजता रहा और दर्शक कुर्सियों पर जमे रहे।
प्रथम प्रवेशी नाटक के निर्देशक उत्कर्ष उपेंद्र सहस्त्रबुद्धे अनेक अवसरों पर चूक गए। नाट्य समारोह की श्रेष्ठ प्रस्तुति एक गधे की आत्मकथा का नामांतरण लापता गधे की खोज रहता तो अधिक श्रेयष्कर था। धोबी की भूमिका में आदर्श मिश्रा, साथी एवं पागल की भूमिका में उत्कर्ष तथा व्यक्ति अमन, चांद महल इब्राहिम तथा अमित कुमार गुप्ता प्रभावी रहे। धोबिन की भूमिका में पहली बार मंच पर उतरी अर्चना निगम में और भी संभावनाएं हैं। उन्होंने अच्छा प्रयास किया। इंस्पेक्टर हेमंत वर्मा तथा स्वामी जी सौरभ शर्मा प्रभावी रहे।
नाटक में सामूहिकता का अभाव कई जगहों पर खटकने वाला था किंतु वरिष्ठ कलाकारों ने इसे छिपाने का बखूबी प्रयास किया। प्रथम प्रयास की दृष्टि से प्रस्तुत नाटक को सर्वश्रेष्ठ कहना अनुचित नहीं होगा किंतु निर्देशक को अभी भी बहुत कुछ सोचने समझने और करने की आवश्यकता है। नागरी नाटक मंडली के द्वारा सृजित निर्देशक की प्रस्तुति निश्चित रूप से मंडली परिवार के लिए गर्व का विषय होना चाहिए। हर्ष गिरि को डेंगू होने के कारण निर्देशक ने स्वयं पागल की उत्कृष्ट भूमिका निभाई।