जांच में शैक्षिक सत्र 2016-17 से जुलाई 2026 तक की उपस्थिति पंजिका का परीक्षण किया गया। इसमें हर्षित गुप्ता का नाम और हस्ताक्षर नहीं मिला। प्रधानाचार्य ने भी अपनी आख्या में बताया कि नियुक्ति से संबंधित कोई पत्रावली विद्यालय में उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके संज्ञान में हर्षित गुप्ता की नियुक्ति कभी नहीं हुई और वह किसी कार्यदिवस में विद्यालय में उपस्थित भी नहीं रहे।
जांच में यह भी सामने आया कि संस्कृत विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति और अनुमोदन की प्रक्रिया विनियमावली के तहत निर्धारित है और नियुक्ति के अनुमोदन का अधिकार जिला विद्यालय निरीक्षक को नहीं था। इसी आधार पर डीआईओएस ने तत्कालीन डीआईओएस के 30 सितंबर 2022 के वेतन भुगतान संबंधी निर्णय को रिकॉल करते हुए प्रकरण का निस्तारण कर दिया।
शिक्षकों की सेवा समाप्ति तक सिमटा विभाग, प्राथमिकी नहीं
प्राचीन धर्म संस्कृत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, प्रयागपुर भुवना बुजुर्ग में नियमविरुद्ध तरीके से की गई 10 सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों के मामले में विभागीय कार्रवाई शिक्षकों की सेवा समाप्ति तक ही सिमटकर रह गई है। नियुक्तियों में कूटरचित अभिलेख तैयार करने और नियमों की अनदेखी के आरोपों के बावजूद अब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई गई है।
तत्कालीन प्रबंधक पर तथ्यों को छिपाकर कूटरचित अभिलेख तैयार करने और संस्कृत शिक्षा नियमों के विपरीत वर्ष 2022 में 10 सहायक अध्यापकों की नियुक्ति कराने के आरोप लगे थे। इसमें तत्कालीन जिला विद्यालय निरीक्षक उमेश कुमार त्रिपाठी और संबंधित पटल से जुड़े कर्मचारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही।
मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद विभाग की ओर से विस्तृत आख्या प्रस्तुत की गई। न्यायालय ने विभाग की आख्या को स्वीकार करते हुए मामले में आगे की कार्रवाई का रास्ता साफ किया। इसके बाद जिला विद्यालय निरीक्षक स्तर से 10 शिक्षकों की सेवा समाप्त कर दी गई।
विभागीय कार्रवाई से यह तो स्पष्ट हुआ कि नियुक्तियों में गंभीर अनियमितताएं थीं, लेकिन सवाल यह है कि यदि नियुक्तियां नियमविरुद्ध थीं तो उन्हें कराने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। प्राथमिकी दर्ज कर पूरे प्रकरण की आपराधिक जांच होने पर ही यह सामने आ सकेगा कि फर्जी नियुक्तियों का पूरा खेल कैसे चला, इसमें कौन-कौन लोग शामिल थे और सरकारी धन के नुकसान की जिम्मेदारी किसकी थी।